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03.20.2014


देखो इन लहरों को

देखो, इन लहरों को!
न छेड़ो,
इसके अस्तित्व की नैसर्गिकता को
सोई ही रहने दो इन लहरों को।
जो अपनी तमन्नाओं की कोहनी का
तकिया बनाए,
किसी भोले शिशु - सी
अपलक झाँकती, निहारती,
कभी मुस्काती, कभी झिझकती,
कभी अपनी अल्हड़ मस्ती में,
बहती जाती अनजान,
खोई है अपने ही में।
देखो, इन लहरों को
न छेड़ो,
इसके अस्तित्व की नैसर्गिकता को
सोई ही रहने दो इन लहरों को।

लगता है,
रोष से है ये दबी – दबी,
तो कभी रूठी हुई सी,
समुद्र की अनगिनत परतों की चादर बिछाए,
और सपनों का लिहाफ ओढ़कर,
सोई है खोई - खोई सी।
जगाने पर प्रश्नों का पुल बनाकर,
छा जाएँगी चारों ओर,
अपनी पारदर्शी पनीली चादर से
आसमां को ढकने की होड़ करती,
छा जाएँगी चारों ओर,
ओर फिर जल - थल हो जायेगा एक।
देखो, इन लहरों को
न छेडो,
इसके अस्तित्व की नैसर्गिकता को
सोई ही रहने दो इन लहरों को।

सुन मानव, मान जा,
न खेल, खेल यह,
प्रकृति पर ज़माने का
अपना आधिपत्य,
धरती की गोद में
जल में, थल में, पल रहे
हर जीव का अपना है महत्व।
देखो, इन लहरों को
न छेडो,
इसके अस्तित्व की नैसर्गिकता को,
सोई ही रहने दो इन लहरों को।


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