अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
10.30.2014


शब्दों की दीपमाला

जहाँ आँगन में अँधियारा वहाँ दीपक जलायें हम
किसी दुखियारे मानव को ख़ुशी देकर हँसायें हम
लबों पर हो दुआ दिल में समन्दर प्यार का छलके
सँवारे ज़िन्दगी सबकी हर इक अरमां सजायें हम

यूँ भरकर रोशनी दामन में धरती पर बिखेरें हम
हर इक आँगन में ख़ुशियों की यूँ रंगोली उकेरें हम
ये दिन सोने से उजले और रातें हो दिवाली सी
अँधेरों में यहाँ कर देंगे पूनम के उजेरे हम

ज़िन्दगी ख़्वाब है प्यारा ये मीठा सा तराना है
दिल में उम्मीद का दीपक हमें हर पल जलाना है
कभी है फूल पथ में तो कभी काँटों की पगडण्डी
इन्हीं राहों पे ख़ुशियों का अब गुलशन खिलाना है

टिका उम्मीद के दम पर ये सारा ही ज़माना है
अँधेरों से सदा लड़कर हमें नभ को झुकाना है
नहीं मुश्किल है कोई भी लगन सच्ची अगर हो तो
मन के मंदिर में ख़ुशियों का अब दीपक जलाना है


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें