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ISSN 2292-9754

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11.12.2014


विज्ञापन की भाषा बनाम साहित्यिक भाषा

विज्ञापन और भाषा का दिलचस्प रिश्ता है। उसकी भाषा में ऐसा लचीलापन है कि गतिशीलता और संभावना की अनचीन्ही परतें दिखाई पड़ती हैं। विज्ञापन-भाषा अपने निश्चित सीमांतों को तोड़कर नित नए मुहावरों में ढलती है। जैसे कवि अपनी कविता में शब्द की अनेक अर्थ-व्यंजनाएँ निर्मित करता है वैसे ही विज्ञापन भी अपने मूल संदेश को सपनों का जामा पहनाकर शब्दों की गलियों से हम तक पहुँचता है। यह भाषा केवल शब्दों की अर्थ-क्रिया से ही नहीं बँधी, यह मीडिया की विशिष्ट प्रकृति से भी जुड़ी है। मीडिया में अर्थ-ग्रहण केवल शब्द के आधार पर नहीं होता। माध्यम की प्रकृति के अनुसार अर्थ-संप्रेषण का आधार - शब्द, ध्वनि, संगीत, चित्र या दृश्य कुछ भी हो सकता है।

चिन्हशास्त्रीय दृष्टि से भाषा की अर्थ-संप्रेषण प्रक्रिया प्रतीक-चिन्हों पर निर्भर है। हर शब्द का निश्चित संकेतित अर्थ है जो विभिन्न प्रतीकों द्वारा अभिव्यक्त होता है। यह प्रतीक ही अर्थ का विनिमय करते हैं। यही संप्रेषण का आधार हैं। विज्ञापन की भाषा अक्सर इन प्रतीकों से छेड़छाड़ करती है। जूडिथ विलियमसन ने अपने लेख ‘मीनिंग एंड आयडियोलोजी’ में विज्ञापन भाषा की अर्थ-संप्रेषण प्रक्रिया पर विस्तार से विचार किया। उनके अनुसार विज्ञापन की भाषा अर्थ का एक नया स्तर निर्मित करती है जो स्थापित अर्थ से भिन्न होता है। वह उत्पाद की विशेषताओं को इस तरह शब्दों में बाँधती है कि हमारे लिए उनके कुछ ख़ास मायने हो जाते हैं। विज्ञापन केवल वस्तु ही नहीं बेचता वह हमारे मन की आकांक्षाओं की पूर्ति करता है। वस्तु और हमारे मन के बीच जो विनिमय घटित होता है विज्ञापन की भाषा उसी ‘स्पेस’ में नए-नए अर्थ निर्मित करती है। जब विज्ञापन का स्लोगन कहता है... ‘हीरा है सदा के लिए’ तब यहाँ केवल हीरा बेचने की बात नहीं है। हीरा मात्र पत्थर का प्रतीक नहीं है। वह शाश्वत प्रेम का प्रतीक है। विज्ञापन की पंक्ति स्थायी तौर पर हमारे मन में ‘हीरे’ को ‘प्रेम’ का प्रतीक बन कर स्थित कर देती है। इसी तरह ‘जॉनसंस बेबी पाउडर’ ममता का नया नाम बन जाता है और ‘कोका कोला’ ठंडे का पर्याय हो जाता है।

आजकल स्कूल-कॉलेजों में बच्चों और युवाओं के बीच एक नया खेल लोकप्रिय हो रहा है जिसे ‘एड-मैड’ या ‘नेम-गेम’ के रूप में जाना जाता है। यह विज्ञापन के दीवानों का खेल है। इसमें एक वस्तु का नाम लिया जाता है और खेलने वाले खिलाड़ी उस वस्तु से जुड़े अनेक ब्रांडों का नाम ले देते हैं। जो ज्यादा ब्रांड याद कर पायेगा वह विजेता होगा इस खेल का एक आशय यह भी है कि विज्ञापन, अर्थ-संप्रेषण की प्रक्रिया में किस चतुराई से एक वस्तु या उत्पाद को एक ब्रांड के नाम में रूपांतरित कर देता है। कॉलगेट आज केवल एक विशिष्ट ब्रांड नहीं है वह टूथपेस्ट का पर्याय बन गई है।

शब्द की अर्थ-संप्रेषण की प्रक्रिया का मुख्य सोपान यही है कि शब्द का उच्चारण होते ही आपके मन में एक चित्र बनता है जो अर्थ संप्रेषित करता है। विज्ञापन की भाषा अपने उत्पाद या ब्रांड को कभी वस्तु के प्रतीक में बदलती है तो कभी उसका संबंध हमारी आकांक्षाओं, हमारे सपनों से जोड़ देती है। वह बड़ी चालाकी से अर्थ-संप्रेषण की प्रक्रिया को नियंत्रित करती है। इतना ही नहीं बहुत बार उस उत्पाद या ब्रांड का संबंध पूरी पीढ़ी या संस्कृति से भी जुड़ जाता है जैसे ‘पेप्सी पीढ़ी’ या ‘कोका कोला कल्चर’ इसी तरह के शब्द-युग्म हैं जो शब्दों के पार जाकर ही अर्थ-संप्रेषित करते हैं।

दरअसल, उपभोक्ता समाज किसी शून्य में नहीं जीता। उसके इर्द-गिर्द एक सामाजिक-सांस्कृतिक घेरा है जो उसके आचार-व्यवहार से लेकर उसकी आशा-आकांक्षाओं से जुड़ा हुआ है। यह संस्कृति का जनप्रिय रूप है जिसे ‘पॉपुलर कल्चर’ कहा जाता है। उपभोक्ता समाज और ‘पॉपुलर कल्चर’ के संबंधों पर अगले खंड में बातचीत होगी लेकिन भाषा के संदर्भ में यह समझना आवश्यक है कि विज्ञापन शब्दों और पंक्तियों की मार्फ़त जो अर्थ हम तक पहुँचाता है वे पॉपुलर संस्कृति के दायरों में ही निर्मित होते हैं। ‘रिलायन्स कम्यूनिकेशन्स’ का विज्ञापन ‘कर लो दुनिया मुट्ठी में’ केवल संचार सेवा का विज्ञापन नहीं है वह किन्हीं मायनों में यह अर्थ संप्रेषित करता है कि विश्व व्यवस्था के नए ढाँचे में युवा-आत्मविश्वास से भरा भारत दुनिया में एक नई पहचान बनाने को बेकरार है। रिलायंस ने ब्रांड के तौर पर विस्मित करने वाली जिस सफलता की कहानी लिखी है, आज उसके नेटवर्क के साथ तुम भी अनहोनी को होनी बना सकते हो, दुनिया मुट्ठी में कर सकते हो। इस सबका सीधा अभिप्राय है कि विज्ञापन भाषा के साक्षात् संकेतित अर्थ को बदलकर नया चिन्हशास्त्र गढ़ता है जिसका संबंध उपभोक्ता के सपनों एवं सामाजिक-सांस्कृतिक आशयों से होता है। विज्ञापन केवल उत्पाद ही नहीं बेच रहा बल्कि उपभोक्ता को उस उत्पाद से जोड़ता है जिसके सामाजिक अर्थ संदर्भ है और एक निश्चित सांस्कृतिक उपस्थिति।

मीडिया भाषा के संदर्भ में प्रो. सुधीश पचौरी इस स्थिति पर टिप्पणी करते हुए लिखते हैं - "मीडिया का काम मूलतः भाषा के ‘प्रतीकों’ या चिन्हों को विनिमित करना होता है। माध्यम के रूप के अनुसार यह विनिमय अपनी गति पकड़ता है।" वे आगे लिखते हैं - "इलैक्ट्रॉनिक मीडिया में इस्तेमाल होते हुए प्रतीक/भाषा के चिन्ह अपने संदर्भों को अस्थिर करते चलते हैं।" इस सारे विश्लेषण से डॉ. पचौरी इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि मीडिया जिस आभासीय यथार्थ की प्रस्तुति कर रहा है उसमें कुछ भी स्थायी और स्थिर नहीं है। उसका कोई भी पाठ एकार्थी न होकर, बहुलार्थी होता है जिसे उन्होंने ‘अर्थ का जनतंत्र’ कहा है।

मीडिया के संदर्भ में कही गई यह बातें विज्ञापन की भाषा पर भी लागू होती हैं। विज्ञापन में माध्यम की अभिव्यंजना यह गुंजाइश बनाती है कि आप अलग-अलग ढंग से उसके अर्थ को विखंडित एवं पुनर्संयोजित कर सकते हैं। इस संदर्भ में आइडिया कंपनी के विज्ञापन उद्धरणीय है। इस कंपनी के विज्ञापनों में हर बार किसी एक विचार को किसी अन्य संदर्भ में उजागर किया जाता है लेकिन हर बार उसका अर्थ केवल वहीं तक सीमित नहीं होता, उसके अन्य आशय भी निकाले जा सकते हैं जो विज्ञापन के उद्देश्य के प्रतिकूल भी हो सकते हैं। कुछ समय पहले आइडिया के एक विज्ञापन में यह तजवीज़ पेश की गई थी कि गाँव के सभी लोगों को एक नम्बर से पहचाना जा सकता है। नम्बर की पहचान जाति-आधारित पहचान को खारिज कर लोकतंत्र की प्रस्तावना करती है। दूसरी ओर इसका एक निहितार्थ यह भी है कि एक व्यक्ति को एक नम्बर में सीमित कर देना क्या उससे उसकी पहचान छीनना नहीं है? उसकी अस्मिता केवल आँकड़े में नहीं बाँधी जा सकती। इस तरह विज्ञापन की भाषा विमर्श के लिए स्पेस बनाती है। यह हम पर है कि हम उन अर्थ-प्रतीकों का संयोजन-विखंडन किस रूप में करते हैं और पंक्तियों के बीच के अर्थ को किस तरह ग्रहण करते हैं।

यह सच है कि विज्ञापन ने भाषा की अनजान संभावनाओं को उजागर किया है लेकिन साथ ही अपने मुनाफे के लिए उसके खुलेपन से खिलवाड़ भी किया है। निश्चित व्यावसायिक उद्देश्यों से बँधी होकर यह भाषा हर नियम से विचलन करती है चाहे वह व्याकरण का हो या अर्थ संप्रेषण का। भाषा संप्रेषण तो बनती है लेकिन अर्थवत्ता, मूल्यवत्ता खो बैठती है। केवल शब्दों का शोर बचा रह जाता है। अक्सर विज्ञापन के कुछ फिकरे या स्लोगन याद रह भी जाएँ तो भी हम उस भाषा से जुड़ नहीं पाते। भाषा के प्रति भाषिक समाज का एक उत्तरदायित्व होता है। उससे बाहर जाकर जब हम भाषा का मनमाना प्रयोग करने लगते हैं तो उससे भाषा की स्वतंत्र अस्मिता खंडित होती है। विज्ञापन की भाषा भाषाओं के साथ इसी तरह का व्यवहार करती है। विज्ञापन भाषा को तीखा, आक्रामक चमकीला रूप तो देता है लेकिन कहीं उसकी संवेदनशीलता को खत्म भी करता है। साहित्यकारों, दार्शनिकों, समाजशास्त्रियों - सबने विज्ञापन जगत द्वारा भाषा की इस छेड़छाड़ के प्रति चिंता जताई है।

हिन्दी भाषा के प्रसिद्ध साहित्यकार उदयप्रकाश ने विज्ञापन और भाषा के इस तनावपूर्ण संबंध पर टिप्पणी करते हुए यह स्वीकार किया कि विज्ञापन ने भाषा को नए रूप से पुनर्संयोजित किया है, उसे नए अवसर दिए हैं लेकिन साथ ही वह जिस तरह की भाषागत तानाशाही खड़ी करता है वह मानवीय अनुभव के विलोम में है, इसकी पहचान करना भी आवश्यक है। कोका-कोला के विज्ञापन का उदाहरण देते हुए उन्होंने अपनी बात स्पष्ट की - ‘ठंडा मतलब कोका कोला’ प्रसून जोशी की बनाई हुई पंक्ति है यह जिसे आमिर ख़ान बोलता है। उसमें एक ब्रांड के लिए, एक सॉफ्ट ड्रिंक के ब्रांड के लिए पूरे मानवीय अनुभव को, आस्वाद को विसर्जित कर दिया गया है ठंडा का मतलब सिर्फ़ कोका-कोला है। इस तरह का आरबिटरेरीनेस, इस तरह की तानाशाही बाज़ार की भी, ब्रांड की भी यह कॉरपोरेट एडवर्टाइज़मेंट करता है और साहित्य, सृजनात्मक कलाएँ इस तरह की तानाशाही के विरुद्ध हमेशा संघर्ष करती हैं। वे बाज़ार के वर्चस्व को तोड़ती हैं। बार-बार बचाती हैं भाषा को, मनुष्य के मूल अनुभव को बचाती हैं।’ एक साहित्यकार के लिए भाषा का दर्जा साहित्य की मूल चेतना में निहित है। इसलिए वहाँ भाषा के सरोकार गहरे हैं। उसके तार मानवीय प्रतिबद्धता से जुड़े हैं जबकि विज्ञापन में यह स्थिति ठीक इसके उलट है। वहाँ प्रतिबद्धता और सरोकार मुनाफे पर टिके हैं।

साहित्यिक भाषा और विज्ञापन की भाषा में अंतर को और स्पष्ट करने के लिए एक उदाहरण से बात समझी जा सकती है। ‘रिन’ साबुन का मशहूर विज्ञापन था ‘भला, उसकी कमीज़ मेरी कमीज़ से सप़फ़ेद कैसे’ - यह विज्ञापन कमीज़ की सफ़ेदी को तुलनात्मक स्तर पर इस्तेमाल करता है और यह प्रतिष्ठित करता है कि यदि आपको सर्वोत्तम सफ़ेदी चाहिए तो वह केवल ‘रिन सफ़ेदी ही हो सकती है। इसमें यह प्रतिक्रिया भी सन्निहित है कि तुरंत जाकर रिन खरीदिए और वह सफ़ेदी पाइए जिस पर और लोग रश्क कर सकें। इस तरह, इस विज्ञापन में एक पंक्ति बहुत-से आशयों को एक-साथ ध्वनित करती है। कम शब्दों में अधिक कह पाने की सामर्थ्य से लैस यह विज्ञापन भाषा की अद्भुत ताकत का नमूना है। इसमें विज्ञापन की भाषा के सभी अनिवार्य गुण जैसे कि ध्यान आकृष्ट करना, स्मृति में बने रहना तथा प्रभावशाली ढंग से उपभोक्ता के मन में खरीदने की चाह जगाने तक का काम यह पंक्ति सुचारू रूप से करती है परंतु यही इसकी सीमा भी है। साहित्य में इन्हीं शब्दों को जब मानवीय सरोकार से जोड़ दिया जाता है तब उनकी धार और व्याप्ति का संसार ही अलग हो जाता है। राजेश जोशी की कविता ‘मारे जाएँगे’ रिन की इस पंक्ति का सर्जनात्मक प्रयोग करती है और आम आदमी के संदर्भ में उसके नए अर्थ देती है। पाठकों की सुविधा के लिए यहाँ पूरी कविता को ही उद्धृत करना प्रासंगिक होगा -

मारे जायेंगे
जो इस पागलपन में शामिल नहीं होंगे
मारे जायेंगे
कटघरे में खड़े कर दिये जायेंगे, जो विरोध में बोलेंगे
जो सच सच बोलेंगे, मारे जायेंगे
बर्दाश्त नहीं किया जायेगा कि किसी की कमीज़ हो
"उनकी" कमीज़ से ज़्यादा सफेद
कमीज़ पर जिनके दाग नहीं होंगे, मारे जायेंगे
धकेल दिये जायेंगे कला की दुनिया से बाहर, जो चारण नहीं
जो गुन नहीं गायेंगे, मारे जायेंगे
धर्म की ध्वजा उठाये जो नहीं जायेंगे जुलूस में
गोलियाँ भून डालेंगी उन्हें, काफ़िर करार दिये जायेंगे
सबसे बड़ा अपराध है इस समय
निहत्थे और निरपराध होना
जो अपराधी नहीं होंगे
मारे जायेंगे।

इस कविता में कवि ने विज्ञापन की पंक्ति का बहुत खूबसूरत प्रयोग किया है। सफ़ेदी की होड़ में कहीं यह आशय छिपा है कि किसी और की कमीज़ मेरी कमीज़ से सफ़ेद कैसे हो सकती है यानी विज्ञापन सफ़ेदी के माध्यम से वर्चस्व का विमर्श भी गढ़ रहा है। कवि उसी ‘वर्चस्व के विमर्श’ को सत्ताधारी बरक्स आम आदमी की सत्ता संरचनाओं के संदर्भ में देखने लगता है और इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि आज के समय का सबसे बड़ा संकट है निहत्थे और निरपराध होना। ऐसे ही लोग सबसे पहले ‘मारे जाएँगे।’ वह यह भी दलील पेश करता है कि सत्ताधारी साम्राज्यवादियों की दुनिया में किसी और की कमीज़ का उनसे ज्यादा सफ़ेद होना बरदाश्त नहीं किया जाएगा। उनकी ताकत के सम्मुख किसी का भी किसी रूप में आगे बढ़ना उनको गवारा नहीं होगा क्योंकि ऐसा करना उनके वर्चस्व के लिए चुनौती बन सकता है। जिनकी छवि स्वच्छ और बेदाग़ होगी वे तो उनके लिए और भी बड़ा खतरा बन सकते हैं इसलिए वे ‘मारे जाएँगे’ यह निश्चित है।

यद्यपि विज्ञापन और कविता दोनों ही अपनी तरह से भाषा को अर्थ-विस्तार और अनन्य व्यंजनाएँ देते हैं तथापि दोनों के सरोकार भिन्न हैं। इसी से उनकी भाषा की शक्ति एवं क्षमता में बुनियादी अंतर है। विज्ञापन अपने विशिष्ट व्यावसायिक उद्देश्यों से बँधा है। तरह-तरह की गवेषणाओं और सुनिश्चित आशयों द्वारा निर्धारित कथ्य को संप्रेषित करना विज्ञापन का काम है। अतः वहाँ भाषा की साधना नहीं होती भाषा का इस्तेमाल होता है यानी भाषा साधन है, लक्ष्य नहीं हालाँकि यह भी उतना ही सच है कि उस निश्चित लक्ष्य की प्राप्ति भाषा को साधे बिना संभव नहीं है।

बहरहाल, विज्ञापन की भाषा पर यह सारी बहस इस बात को सिद्ध करने के लिए थी कि विज्ञापन की भाषा का अपना विशिष्ट स्वरूप होता है जो साहित्यिक भाषा से भिन्न होता है, मीडिया या माध्यम पर आश्रित होता है। इस भाषा में व्याकरण एवं अर्थ की दृष्टि से विचलन होता है। यहाँ संप्रेषण ही प्रधान है और उसके लिए ही तरह-तरह से भाषा का विखंडन एवं पुनःसंयोजन होता है जो भाषा के नए मुहावरे निर्मित करते हुए उसे अर्थ की बहुलता, अनेकस्तरीयता प्रदान करता है।
विज्ञापन के अध्येता के लिए भाषा के इस विशिष्ट स्वरूप को समझने के साथ-साथ यह भी ज़रूरी है कि वह यह समझे कि विज्ञापन की भाषा में कौन-कौन से गुण होने चाहिए और उन्हें भाषा में किन उपकरणों द्वारा उत्पन्न किया जा सकता है।

विज्ञापन भाषा के गुण

विज्ञापन की भाषा संवाद एवं संप्रेषण के अतिरिक्त भी कार्य करती है। यहाँ संप्रेषण की प्रक्रिया संप्रेषण से अधिक मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया है जहाँ शब्दों का संचरण उपभोक्ता के मन-मस्तिष्क पर छा जाने के लिए होता है। शब्द हों या वाक्य-इस भाषा का पूरा बल उनके प्रभाव पर है और इस विशिष्ट प्रभाव को निर्मित करने के लिए विज्ञापन की भाषा में कुछ गुणों का होना अनिवार्य है।

1. रचनात्मकता -

किसी भी भाषा की सिद्धि उसकी रचनात्मकता में ही निहित है। भाषा का सृजनात्मक स्वरूप ही उसे गतिशील बनाए रखता है। विज्ञापन की भाषा में यह रचनात्मकता अलग-अलग रूप ग्रहण करती है। कभी उसे काव्यात्मक बनाया जाता है तो कभी नाटकीय। कोशिश यह रहती है कि जो भी कहा जाए उसकी प्रस्तुति ऐसी हो कि लगे ऐसा पहले कभी नहीं सुना। इस भाषा का तालमेल चित्रों, दृश्यों, बिंबों, संगीत आदि से भी करना पड़ता है। विज्ञापन के कॉपी लेखक के लिए यह एक बड़ी चुनौती है। अतः विज्ञापन भाषा की रचनात्मकता किसी भी प्रकार साहित्यिक रचनात्मकता से कम नहीं आँकी जा सकती बल्कि कभी-कभी तो विज्ञापन लेखन स्वतंत्र, स्वायत्त लेखन से अधिक जटिल बन जाता है। विज्ञापन ‘माँग पर किए गए लेखन’ (writing on demand) का उदाहरण है। यह लेखन अपनी इच्छा पर निर्भर या अपनी तुष्टि के लिए नहीं होता। यह लेखन व्यावसायिक उद्देश्यों से बँधा है। विभिन्न गवेषणाएँ पहले ही उसकी सीमाएँ सुनिश्चित कर देती हैं। इन माँगों, इन दबावों के बीच भी विज्ञापन की भाषा को अपनी सृजनात्मकता को जीवित रखना पड़ता है। कल्पना की उड़ान ही उसे निर्जीव, उबाऊ या रसहीन होने से बचाती है। यही कल्पना, कलात्मकता विज्ञापन की भाषिक रचनात्मकता का प्रथम सोपान है।

2. ध्यानाकर्षण क्षमता -

धिकांश मीडियाकारों ने ध्यान-आकर्षित करने की क्षमता को विज्ञापन की कसौटी माना है। विज्ञापन में कुछ ऐसा होना चाहिए कि वह आपकी जड़ता तोड़कर आपको झकझोर दे। आपका ध्यान बरबस अपनी ओर खींच ले। इसके लिए जहाँ विज्ञापन अलग-अलग अपील अपनाते हैं वहीं भाषा की भी सक्रिय भूमिका होती है। वास्तव में भाषा ही कभी काव्यात्मक तुकबंदी में, कभी व्यंग्यात्मक टोन में, कभी शब्दों के कुशल-संयोजन से ध्यान आकर्षित करने का कार्य करती है। अक्सर विज्ञापनों में ‘फ्री’ शब्द देखते ही ध्यान उस ओर लग जाता है। इसी तरह ‘सेल’ ‘भारी डिस्काउंट’, ‘छूट’, ‘धमाका’ आदि शब्दों का इस्तेमाल उपभोक्ताओं को आकर्षित करने के लिए ही किया जाता है। दोमिनोज़ पिज़ा की मुख्य पंक्ति "hungary kya" ध्यान आकर्षित करने के लिए दो भाषाओं को मिलाकर एक नया फिकरा गढ़ने की तकनीक का उदाहरण है। कभी-कभी किसी भी प्रचलित शब्द को विज्ञापन एक नया संदर्भ देकर नए रूप में प्रस्तुत कर देता है और वह सहज ही आकर्षक बन जाता है। पेप्सी के विज्ञापन ‘ये है youngistan मेरी जान....’ में यंगिस्तान ऐसा ही शब्द है जो हिंदुस्तान के लाखों युवा दिलों की धड़कन बन गया है।

3. स्मरणीयता -

तंदरूस्ती की रक्षा करता है लाइफबॉय,
लाइफबॉय है जहाँ तंदरूस्ती है वहाँ

ज़माना बदल गया और लाइफबॉय साबुन की विज्ञापन अपील भी बदल गई लेकिन जिन्होंने भी ये पंक्तियाँ सुनी हैं, वे आज तक उसे भूल नहीं पाए। विज्ञापन की भाषा ऐसी ही होनी चाहिए कर्णप्रिय और पठनीय - सुनने में अच्छी लगे और पढ़ने में एक रोमांच पैदा करे जिससे कि वे शब्द हमारी स्मृति का हिस्सा बन जाएँ। अक्सर बच्चों की भाषा में विज्ञापन के बहुत-से टुकड़े समाए रहते हैं। जब वे कहते हैं कि उन्हें ‘मैगी ही चाहिए’ या फिर ‘बड़ी प्यास लगी है’ तो बड़ी प्यास पेप्सी के ‘ये प्यास है बड़ी’ विज्ञापन के स्लोगन से अनजाने ही उनकी भाषा में चला आता है। ऐसा माना जाता है कि शब्दों का संबंध विज्ञापन से है और विज्ञापन का उत्पाद से तो यदि विज्ञापन उपभोक्ता की स्मृति में दर्ज हो जाए तो उत्पाद भी अवश्य ही उसे याद रहेगा। इस उद्देश्य को ध्यान में रखकर ही विज्ञापनकर्ता ऐसी भाषा प्रयुक्त करते हैं जो तत्काल याद हो जाए।

विज्ञापन की स्मरणीयता के लिए भाषा के अनेक उपकरणों को साधना पड़ता है जिनमें सबसे प्रमुख है - काव्यात्मकता। सुर-संगीत से सजे कविता में ढले शब्द सबसे जल्दी याद हो जाते हैं। ऐसे बहुत से विज्ञापन हैं जो समय के लंबे अंतराल के बाद भी अपनी भाषागत स्मरणीयता के कारण जीवित हैं -

निरमा, वॉशिंग पाउडर निरमा
निरमा, वॉशिंग पाउडर निरमा
दूध सी सफेदी
निरमा से आए
रंगीन कपड़ा भी खिल-खिल जाए
सबकी पसंद निरमा
वॉशिंग पाउडर निरमा

विज्ञापनों में विशेषतः टैगलाइन या सूत्रवाक्य तो निश्चित रूप से ऐसी भाषा में लिखे जाते हैं जो लंबे समय तक उत्पाद की पहचान बने रहते हैं जैसे ‘ठंडा मतलब कोका कोला’, ‘कुछ मीठा हो जाए’ (डेरी मिल्क चॉकलेट)

4. सरलता-बोधगम्यता -

‘स्पराइट’ का विज्ञापन है - ‘सीधी बात बाकी सब बकवास’ -

यह पंक्ति तमाम विज्ञापनों की भाषा के लिए सही है। विज्ञापन की भाषा सरल, संक्षिप्त और बोधगम्य होनी चाहिए। बात को सीधे-सीधे इस रूप में कहा जाए कि सुनने या पढ़ने वाले की समझ में आसानी से आ जाए। प्रिंट और इलैक्ट्रोनिक - सभी माध्यमों में अधिक विस्तार का अवकाश नहीं होता। कहीं स्थान की सीमा होती है तो कहीं समय की। इसलिए जो भी बात कहनी हो उसे कम से कम शब्दों में रखा जाना चाहिए। यह आवश्यक है कि विज्ञापन की भाषा में कसावट हो, वाक्य छोटे, चुस्त और सटीक हों। उनमें गति और रवानगी हो जिससे कि तुरंत समझ में आ जाएँ। इसी दृष्टि से विज्ञापन में केवल एक विशेषता पर ही फोकस किया जाता है। उसी को यदि ठीक से संप्रेषित कर दिया तो विज्ञापन अपने प्रयत्न में सार्थक होगा।

विज्ञापन की भाषागत सरलता का अभिप्राय यह कतई नहीं है कि इस भाषा में लाक्षणिकता या व्यंजनात्मकता नहीं होती। सच्चाई तो यह है कि विज्ञापन की भाषा आसान से दिखने वाले शब्दों में असंख्य अर्थ-व्यंजनाएँ भर देती है लेकिन उसकी शक्ति इस बात में है कि व्यंजित निहितार्थ आसानी से पकड़ में आ जाए। कभी-कभी तो ऐसे भी विज्ञापन होते हैं जो नकारात्मक शब्दों में सकारात्मक संदेश प्रस्तुत कर देते हैं। उनसे ध्यान भी आकर्षित होता है और अभिव्यक्ति को भी विस्तार मिलता है।

ओनिडा टी.वी. का विज्ञापन ‘आपकी शान पड़ोसी की जले जान’ या फिर सर्फ़ एक्सल का ‘दाग अच्छे हैं’ बहुत लोकप्रिय हुए। यह नकारात्मक टोन में सकारात्मक प्रभाव रचते हैं लेकिन इनका महत्व मुख्यतः इसलिए है कि दोनों में ही व्यंजना पकड़ना कोई टेढ़ी खीर नहीं है। यही इस भाषा की सार्थकता है कि आम बोलचाल की भाषा हो पर सीधे-सादे शब्दों में वह सामान्य अर्थ से कुछ अधिक कहती हो और उसके संदेश को समझने में, उसे डिकोड करने में किसी तरह की कठिनाई न हो।

5. नियम निर्बंधता -

व्याकरण विचलन - विज्ञापन भाषा के इस गुण को हम कोई भी नाम दें इसका अभिप्राय यह है कि भाषा के स्थापित ढाँचे यहाँ कारगर नहीं होते। भाषा को उनसे मुक्त करना पड़ता है। यहाँ भाषा की शुद्धता का कोई आग्रह नहीं होता। भाषा के खुलेपन के कारण ही यहाँ भाषा में भाषाओं का मिश्रण हो जाता है और शब्दों की परस्पर आवाजाही चलती रहती है। हिन्दी में बात करते-करते अंग्रेज़ी के शब्द चले आते हैं - ‘ठंडा-ठंडा cool-cool" (नवरत्न तेल) इसी तरह व्याकरण के बंधन भी विज्ञापन की भाषा को बाँध नहीं सकते। विज्ञापन के जितने भी सूत्रवाक्य हैं अधिकांशतः क्रियाविहीन वाक्य हैं - मिर्ची सुनने वाले always खुश (रेडियो मिर्ची) कभी-कभी नई क्रियाएँ गढ़ ली जाती हैं - क्या आप क्लोज़ अप करते हैं (क्लोज़ अप टूथपेस्ट) यहाँ क्लोज़ अप टूथपेस्ट ही ब्रश करने का पर्याय बन गया है।

ऐसा करना सही है या गलत यह बहस का अलग मुद्दा हो सकता है। फिलहाल यह समझना ज़रूरी है कि विज्ञापन की भाषा में भाषा के कोई निश्चित नियम नहीं होते सिर्फ़ उद्देश्य प्रधान होता है। यदि वह संदेश संप्रेषित कर पाती है तो उसका उद्देश्य पूर्ण समझा जाता है।

6. जीवंतता -

से नाटक की भाषा हरकत की भाषा है उसी तरह विज्ञापन की भाषा भी हरकत की भाषा है। विज्ञापन में दृश्यबंध के बहुत मायने हैं। प्रिंट माध्यम का विज्ञापन हो तब सबसे पहले इसी बात पर ध्यान दिया जाता है कि पूरा विज्ञापन पढ़ने से पहले दिखने में कैसा लगेगा, रेडियो विज्ञापन हो तब भी सुनते वक्त वह श्रोता के मन में छवियों को किस रूप में अंकित करेगा तथा टेलीविज़न विज्ञापन हो तो वह दृश्य और ध्वनि के साथ ही प्रकट होगा। कुल मिलाकर, प्रत्येक स्थिति में विज्ञापन की भाषा में दृश्यात्मकता, सजीवता अपरिहार्य हैं। इसे ही हरकत की भाषा कहा जा रहा है यानी शब्द सिर्फ़ कहते न हों धड़कते हों, बिंब रचते हों, सप्राण और जीवंत हों। मारुति सुज़ुकी की नई आल्टो का विज्ञापन भाषिक जीवंतता का प्रमाण है।

बूँदों में जाने क्या अलग है
बूँदों में जाने क्या नया है
इठलाती बलखाती लहराती बहकाती
नखरे दिखाती बूँदें तनमन पिघलाती बूँदें...
बूँदों में जाने क्या अलग है

7. विश्वसनीयता -

विज्ञापन अतिरंजना पर टिका है। अपने उत्पाद को श्रेष्ठतम साबित करने के लिए वहाँ विशेषणों की उच्चतम अवस्था का प्रयोग किया जाता है। ‘सबसे बेहतर’, ‘सबसे कम कीमत वाला’, ‘सबसे अधिक बिकने वाला’, ‘भारत का एकमात्र...’ आदि विशेषण पदबंध विज्ञापनों में बेलौस प्रयुक्त किए जाते हैं लेकिन इन सब दावों पर उपभोक्ता को यकीन तभी होगा जब उसे विश्वसनीय ढंग से कहा जाएगा। उपभोक्ता को उत्पाद के गुणों के विषय में आश्वस्त करना बेहद ज़रूरी है। विज्ञापनों में बड़े-बड़े अभिनेताओं या खिलाड़ियों के मुख से जब उत्पाद की पैरवी कराई जाती है तो वह मुख्यतः उपभोक्ता का विश्वास जीतने का ही उपक्रम है। भाषा में यह गुण होना चाहिए कि वह असंभव अतिश्योक्तिपूर्ण न प्रतीत हो बल्कि विश्वसनीय हो। घड़ी डिटर्जेंट का विज्ञापन यह अपील करता है - ‘पहले इस्तेमाल करें फिर विश्वास करें।’ इंश्योरेन्स कंपनियों के विज्ञापन भी भरोसे और विश्वास की ऐसी ही भाषा बोलते हैं। ‘फेयर एंड लवली’ दस दिनों में गोरा बनाने का दावा करता है तो डव साबुन भी उपभोक्ताओं की चुनौती के लिए तैयार है। विश्वसनीयता जगाने के लिए अनेक पद्धतियों का प्रयोग किया जाता है। जे. के. लक्ष्मी सीमेंट का विज्ञापन इस दृष्टि से विशेष उल्लेखनीय है -

ये है उभरता हुआ भारत
इसकी गैरेंटी कौन लेता है
हज़ारों गाड़ियों का वज़न, सुरक्षा की गैरेंटी
200 टन की सेफ लैंडिंग की गैरेंटी
आसमान को छूती इमारतों में चैन की नींद की गैरेंटी
ज़िन्दगी आपकी, गैरेंटी हमारी
वॉयस ओवर जे. के. लक्ष्मी सीमेंट मज़बूती गैरेन्टीड
ओम पुरी - कल का भारत गैरेन्टीड। यहाँ भारत के विकास के दृश्यों के बीच अभिनेता ओमपुरी सुरक्षा की गैरेंटी देते हुए उपभोक्ता के मन में जे.के. लक्ष्मी सीमेंट के लिए विश्वसनीयता जगाते हैं।

8. प्रेरक प्रतिक्रिया -

ज्ञापन का काम आपके मन की इच्छा को खरीदारी में बदल देने का है। अतः इसकी भाषा में भी वह गुण होना चाहिए कि खरीदने की बेचैनी पैदा कर दे।

‘जल्दी कीजिए, ऑफर सिर्फ़ सीमित समय तक’
‘जल्द घर ले आइए’
‘अब आसान किश्तों पर’

यह सभी अनुरोध कहीं न कहीं उपभोक्ता में सक्रिय प्रेरक प्रतिक्रिया जगाने के लिए ही किए जाते हैं। बहुत पहले प्रेस्टीज प्रेशर कुकर का एक विज्ञापन आता था जिसमें कहा जाता था ‘जो बीवी से करे प्यार, प्रेस्टीज से कैसे करे इंकार’। यह पंक्ति भी उपभोक्ताओं में प्रेरक प्रतिक्रिया उत्पन्न करने के लिए ही लिखी गई थी। विज्ञापन की भाषा कभी मनुहार से तो कभी चुनौती से उपभोक्ता को वस्तु खरीदने के लिए बाध्य करती है।

विज्ञापन के विविधमुखी उद्देश्यों की दृष्टि से विज्ञापन भाषा में इन गुणों का होना अनिवार्य माना गया है लेकिन असली चुनौती इस बात में है कि भाषा के किन उपकरणों द्वारा उसमें यह गुण उत्पन्न किये जा सकते हैं। अगले अंश में हम यही समीक्षा करेंगे कि विज्ञापन की भाषा को इतना आकर्षक और चमत्कारी बनाने में भाषा के किन उपकरणों की क्या भूमिका है।

विज्ञापन भाषा के उपकरण

भाषा की सार्थकता केवल भाषा प्रयोग के विविध रूपों में ही सन्निहित नहीं है अपितु उसकी जीवंतता का असली प्राणतत्व भाषा से किए जाने वाले प्रयेागों में गतिशीलता पाता है। विज्ञापन की भाषा इस सच्चाई को साक्षात करती है। विज्ञापन भाषा से उम्मीद की जाती है कि वह आम बोल-चाल की, लोक व्यवहार की भाषा होकर भी उससे भिन्न दिखे। यह संतुलन साधना अत्यंत कठिन है। भाषा के जानकर सचेत प्रयास द्वारा इसे संभव बनाते हैं। इसके लिए आवश्यक है कि हमें भाषा के अवयवों की पूरी जानकारी हो और उनके वैविध्यपूर्ण प्रयोगों से हम परिचित हों। इस अंश में भाषा की प्रक्रिया एवं उसके उपकरणों को समझने-समझाने की कोशिश की जा रही है।

शब्द और अर्थ

भाषा की गतिशीलता की कसौटी उसकी अर्थ-निष्पादन शक्ति है। हर शब्द के भीतर एक अर्थ तत्व समाहित है जिसे शब्द की विभिन्न शक्तियों द्वारा उजागर किया जाता है। भारतीय परंपरा में इन शब्द-शक्तियों का विशेष महत्व है क्योंकि इन्हीं के माध्यम से साक्षात संकेतित अर्थ भी ग्रहण किया जाता है और उसके आगे बढ़कर लक्षित एवं व्यंजित अर्थ का भी संप्रेषण होता है। यह पारंपरिक शब्द-शक्तियाँ संदर्भ से पैदा होने वाले अर्थ तथा वक्ता के तात्पर्य से प्रेरित वृत्तिमूलक अर्थ के विविध स्तरों को व्यंजित करने में सक्षम हैं। शब्द-शक्तियों के साथ-साथ विशिष्ट अभिप्रेत अर्थ की व्यंजना का एक स्तर भारतीय काव्यशास्त्र में ‘ध्वनि-मीमांसा’ द्वारा भी स्पष्ट किया गया है।

आधुनिक चिंतन परंपरा शब्द के अभीष्ट अर्थ की व्यंजना की अभिव्यक्ति denotation तथा connotation के द्वारा करती है। शब्द की अर्थ-निष्पादन प्रक्रिया में इनका विशेष महत्व है। उत्तर-आधुनिक वैचारिकी अर्थ के इन्हीं स्तरों द्वारा ‘पाठ’ (text) का ‘विखंडन’ (deconstruction) कर विचार और व्यवहार की अनगिनत सतहों को संप्रेषित करती है। इन्हीं के द्वारा एक-एक पंक्ति की व्याख्या (दृष्टिबोध की विविधता को आधार बनाकर) अनेक स्तरों पर संभव होती है। विज्ञापन की भाषा अत्यंत कौशलपूर्ण ढंग से शब्द के मुख्यार्थ के साथ जुड़ी अनेकमुखी अर्थ-छवियों को स्पष्ट करती है। विज्ञापन की दुनिया में शब्द एवं अर्थ के बीच सदा ऐसा तनाव उत्पन्न किया जाता है कि शब्द कभी-कभी अपना मूल अर्थ पूर्णतः खोकर, नए अर्थ ग्रहण कर लेता है, जैसे कि - ‘दाग अच्छे हैं’

यहाँ ‘दाग’ शब्द का ‘मैल भरे धब्बे’ वाला साधारण अर्थ कहीं बहुत पीछे छूट गया है और उन दागों की बात की जा रही है जो मन के मैल छुड़ाने में लग जाते हैं। वे दाग अच्छे ही नहीं, स्पृहणीय है। इस अर्थ के आगे भी एक ध्वनि है कि इन दागों की क्या चिन्ता जब ‘सर्फ़ एक्सल है ना!’ इस तरह ‘भाषा से’ और ‘भाषा के’ विभिन्न प्रयोग हो सकते हैं। सामान्य शब्दों का भी नए ढंग से प्रयोग कर उनकी अर्थ-निष्पादन शक्ति को कई गुना बढ़ाया जा सकता है। शब्द और अर्थ का यह तनावपूर्ण रिश्ता जितनी कुशलता से स्थापित किया जाएगा विज्ञापन जगत में उसका उतना ही महत्व बढ़ेगा। एक अन्य उदाहरण से यह बात और स्पष्ट हो सकेगी। पेप्सी के विज्ञापन की पंक्ति है -

‘ये प्यास है बड़ी’

यहाँ ‘बड़ी प्यास’ का संबंध पेप्सी से जोड़ा गया है। ‘बड़ी’ शब्द भाववाचक संज्ञा ‘प्यास’ का विशेषण बनकर आया है। ‘बड़ी’ शब्द यहाँ केवल अधिक का पर्याय नहीं है। अर्थ-निष्पादन प्रक्रिया में यह शब्द साधारण प्यास से पेप्सी की प्यास का पार्थक्य स्थापित करता है। इसकी एक अर्थ-संभावना यह भी हो सकती है कि ‘प्यास’ का संबंध कुछ पाने की ललक से भी है। अतः कुछ ऊँचा चाहना, कुछ बड़ा पाने के लिए बेचैन होना भी इसके लक्षित अर्थ में सन्निहित है। अब बड़ी प्यास का उस तरह अर्थ विस्तार करके उसे एक ब्रांड विशेष के लिए रूढ़ किया जाता है। विज्ञापन के ये शब्द अलग-अलग माध्यमों में अपनी उपस्थिति जताते हुए उन अर्थ-छवियों को उस ब्रांड से जोड़ देते हैं। इस तरह एक या दो शब्दों में ही, जो देखने में बिल्कुल सरल-स्वाभाविक हैं, अर्थ का विस्तृत क्षेत्र उभर आता है। इतना ही नहीं उसमें वे अर्थ भी जुड़ जाते हैं जिनके विषय में पहले सोचा ही नहीं गया था, जैसे इस उदाहरण में देखें तो जिन दिनों पेप्सी का यह विज्ञापन चल रहा था उसके ब्रांड अम्बेसडर अमिताभ बच्चन यानी ‘बिग बी’ थे। मनोरंजन और व्यापार की दुनिया अमिताभ बच्चन को कामयाबी और शोहरत का शहंशाह मानती है उनका दर्जा सामाजिक क्षेत्र में बहुत बड़ा है। पेप्सी की ‘बड़ी प्यास’ को बिग बी के समर्थन से और भी बड़प्पन मिल गया। कुल मिलाकर, विज्ञापन की भाषा में रचनात्मकता पैदा करने के लिए यह ज़रूरी है कि आपको शब्दों से खेलना आता हो। साधारण बोलचाल के शब्दों में नए अर्थ भर देना विज्ञापन भाषा की खूबी है जिसे अत्यंत सचेत भाव से संभव बनाया जाता है। इसके लिए शब्द के अर्थ संप्रेषित करने वाले विभिन्न स्तरों की पूरी जानकारी होनी चाहिए। साथ ही अलग-अलग शब्दों की अर्थ-छवियों की बारीक पहचान भी ज़रूरी है।

शब्द-चयन

विज्ञापन के संदर्भ में जितना महत्वपूर्ण यह है कि हम शब्दों में नए-नए अर्थ भर दें उतना ही महत्वपूर्ण शब्दों का चुनाव भी है। विज्ञापन की चुनौती कम शब्दों में अधिक संप्रेषित करने की है। अतः शब्द ऐसा हो जो विस्तृत अर्थ-बहुलता को वहन कर वांछित प्रभाव के सृजन में सक्षम हो यानी विज्ञापन के शब्द साभिप्राय प्रयुक्त होते हैं। वहाँ एक भी शब्द फालतू रखने या कम करने की गुँजाइश नहीं छोड़ी जाती। खासतौर पर विज्ञापन के स्लोगनों में यह प्रवृत्ति देखी जा सकती है। इस उद्देश्य के लिए उपलब्ध शब्दों को नए संदर्भ में भी प्रयोग किया जा सकता है और कुछ नए शब्द भी गढ़े जा सकते हैं। यदि उदाहरण लेकर बात करें तो, एक पंक्ति है -

‘तूफ़ानी ठंडा, थम्स अप’

इसी विज्ञापन का अंग्रेज़ी स्लोगन है ‘टेस्ट द थंडर’ इसी की तर्ज़ पर हिन्दी में इसे तूफ़ानी ठंडा कहा गया। तूफ़ान - भाववाचक संज्ञा है जिससे विशेषण बना तूफ़ानी और उसका प्रयोग शीतल पेय के लिए किया गया। शीतल पेय को वर्णित करने वाले जितने भी शब्द हो सकते हैं उनमें ‘तूफ़ानी’ विशेषण किसी भी कल्पना के करीब तक नहीं है। सामान्यतः यदि विद्यार्थियों को शीतल पेय का विज्ञापन लिखने को दिया जाए तो जो शब्द सबसे पहले ध्यान में आते हैं उनका सारा बल ‘शीतलता’ ‘मिठास’ ‘अजब स्वाद’ आदि पर होता है। ‘ठंडा मतलब कोका कोला’ में भी यही ध्वनि मिलती है। अब यदि स्वाद को परिभाषित करना हो तो ऐसा विशेषण, ऐसा शब्द चाहिए जो उस अनुभव के अहसास को ठीक-ठीक जगा सके। ‘तूफ़ानी ठंडा’ ऐसा ही प्रयोग है जो उस शीतल पेय के स्वाद को पूरे आवेग एवं नाटकीयता से अभिव्यक्त कर पाता है। इस संदर्भ में यह भी उल्लेखनीय है कि यह शब्द चयन उत्पाद की अपील को अभिव्यक्त करने में इतना समर्थ है कि उसे किसी अन्य शब्द से बदला नहीं जा सकता।

इस दृष्टि से एक और पंक्ति याद आती है जिस पर काफी बहस चली -

‘ये दिल माँगे मोर ...’

यह पंक्ति जब आई उन दिनों हिन्दी-अंग्रेज़ी मिलाकर इस्तेमाल करने का चलन नया-नया था। बहुत-से लोगों को भाषा के इस प्रयोग पर सख़्त एतराज़ था। उनका कहना था कि ‘दिल माँगे मोर’ क्यों, ‘दिल माँगे और’ क्यों नहीं हो सकता? इस ‘मोर’ के बचाव में भी कम लोग नहीं थे। वे ‘माँगे मोर’ के अनुप्रास पर रीझे हुए थे। उनका तर्क था कि माँगे मोर जिस तरह की सरसता पैदा करता है वह ‘माँगे और’ कभी नहीं ला सकता। कॉपी लेखकों का इसमें तीसरा पक्ष था कि वे लक्षित उपभोक्ता वर्ग में अंग्रेज़ीदां शहरी तबके को भी संबोधित करना चाहते थे। अंग्रेज़ी का ‘मोर’ हिन्दी जानने वाले को भी समझ आ जाता था और अंग्रेज़ी जानने वाले के लिए स्लोगन पंक्ति को उनके परिचित भाषिक क्षेत्र में ले आता था जिससे उसकी व्यापकता कई गुना बढ़ गई थी। एक और कारण यह भी था कि अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में पेप्सी का स्लोगन था ‘आस्क फॉर मोर’ इस स्लोगन के ‘मोर’ शब्द को हिन्दी के स्लोगन में बचाए रखने में उसकी अंतर्राष्ट्रीय पहचान भी बनी रहती थी।

विज्ञापन के लिए शब्द-चयन करते हुए अनेक दृष्टियों से सावधान रहना पड़ता है। किसी भी रचनात्मक लेखन में शब्द के चुनाव का विशेष महत्व है। अपने भावों की सटीक अभिव्यक्ति के लिए जैसे रचनाकार अनेक पर्यायों के बीच से किसी एक विकल्प को उसकी अर्थ-ध्वनि या शैली की उपयुक्तता के आधार पर चुनता है उसी तरह विज्ञापन के कॉपी लेखक को भी यह काम अत्यंत सचेत भाव से करना पड़ता है क्योंकि वहाँ शब्द-चयन के पीछे सटीक अभिव्यक्ति के अतिरिक्त अनेक इतर उद्देश्यों का दबाव भी रहता है।

विज्ञापन के कुछ शब्द बहुत बार किसी अर्थ-विशेष से अधिक किसी विचार, अवधारणा या फिर पूरी संस्कृति के वाहक बन जाते हैं। कैडबरी के ‘कुछ मीठा हो जाए’ में ‘मीठा’ शब्द मिठाई के प्रतीक रूप में प्रयुक्त हुआ है और उन सभी सांस्कृतिक आशयों को वहन करता है जो जीवन में शुभ खुशियों से जुड़े हैं, फिर चाहें वह वार-त्यौहार हों, पप्पू का पास होना, महीने की पहली तारीख या शुभारंभ। ‘कुछ मीठा हो जाए’ में केवल एक शब्द अनेक व्यंजनाएँ प्रस्तुत कर देता है।

कभी-कभी कुछ ऐसे शब्द भी चुने जाते हैं जो प्रतिस्पर्धी ब्रांड के विज्ञापन पर आघात करते हैं जैसे कैडबरी के पहली तारीख वाले विज्ञापन के प्रत्युत्तर में ‘नेसले मंच’ के विज्ञापन में यह टिप्पणी थी कि इसे किसी भी तारीख पर खाया जा सकता है। इसी तरह जब थम्स अप ने स्वयं को ‘ग्रोनअप्स’ या वयस्कों का पेय घोषित किया तो पेप्सी का जवाब आया ‘हू वान्ट्स टू ग्रो अप’। यहाँ नए शब्द लाने की अपेक्षा दूसरे विज्ञापन के शब्दों को ही चुनकर उन्हें नई अर्थ-दिशा की ओर मोड़ दिया गया है।

शब्द चयन की ही दृष्टि से विज्ञापनों में विशेषणों की महत्वपूर्ण सत्ता है। प्रायः विज्ञापन अपने दावे पेश करने के लिए विशेषण की उच्चतम अवस्था (superlatives) का प्रयोग करता है- ‘सबसे बेहतर’, ‘सबसे सस्ता’, ‘नंबर वन’, ‘नया’, ‘ताज़ा’, ‘बेहतरीन’ आदि। जहाँ एक ओर अपने उत्पाद को सर्वश्रेष्ठ सिद्ध करने के लिए यह दावे किए जाते हैं वहीं दूसरी ओर उनकी सच्चाई पर उठने वाले सवालों से बचने के लिए कुछ ऐसे शब्द भी जोड़ दिए जाते हैं जो उपभोक्ता को गुमराह कर सकते हैं। विज्ञापन योजनाओं में शब्दों का यह खेल साफ देखा जा सकता है। उन बड़े-बड़े दावों के नीचे बहुत छोटा लिखा होता है ‘शर्तें लागू’। इस स्थिति में उपभोक्ता को तो सावधान रहने की आवश्यकता है लेकिन शब्द चयन की दृष्टि से यह विज्ञापन लेखक की सचेतता का प्रमाण है। ऐसे प्रयोग से वह रचनात्मकता और बाज़ार-दोनों के तनाव को बखूबी साध लेता है।

सादृश्य विधान

सादृश्य विधान किसी भी सर्जनात्मक लेखन की सबसे बड़ी कसौटी है। अपने अनुभव संसार को सदा हू-ब-हू बयान करना मुश्किल भी है और नीरस भी। हमारे आस-पास घटता है उसका ब्यौरेवार वर्णन सुनना किसे अच्छा लगेगा यदि उसी अनुभव को किसी और के समतुल्य बनाकर प्रस्तुत किया जाए तो कथन भंगिमा में तो नवीनता आती ही है अनुभव भी कुछ नया-नया लगने लगता है। भौतिक सीमाएँ तोड़कर वह कल्पना की उड़ान भरता है। काव्यशास्त्रीय भाषा में इसे अप्रस्तुत द्वारा प्रस्तुत की अभिव्यक्ति कहा जाता है जिसका प्रमुख उदाहरण ‘मुख चंद्रमा के समान सुंदर है’ के रूप में दिया जाता है। यहाँ मुख प्रस्तुत है, चंद्रमा अप्रस्तुत। प्रस्तुत को अप्रस्तुत के समान बताकर अभिव्यक्ति में चमत्कार उत्पन्न किया जाता है। यह समानता साहित्य क्षेत्र में बिंब, प्रतीक एवं अलंकारों द्वारा उत्पन्न की जाती है। विज्ञापन में भी एक अलग ढंग से इन भाषिक उपकरणों का प्रयोग होता है। विज्ञापन की भाषा कलात्मक चमत्कारी भाषा है जो पाठक, श्रोता, दर्शक के भाव जगत को छूती है। यह जादुई संस्पर्श शब्दों की भावात्मक शक्ति जगाने से उत्पन्न होता है। जैसे जे.पी. पॉवर के विज्ञापन में देखा जा सकता है।

टिम टिम ताना- ताना रे रे ना ना रे
टिम टिम ताना- ताना रे रे
हम रोशनी को ख्वाबों के पर लगाके लाएँगे
हम अपनी ज़मीं के अंधियारे सजायेंगे
हम अपनी ज़मीं को सितारों से सजायेंगे
रोशनी ज़मीं को कर जाएँगे
हम हैं जेपी ग्रुप No dream too big

प्रस्तुत पंक्तियाँ शब्दों की चित्रात्मक शक्ति के माध्यम से अँधेरे से रोशनी का बिंब रचती हैं।
यहाँ गीत की तरलता, भावात्मकता, कल्पना सब मिलकर एक अनुभव की सृष्टि करते हैं। पॉवर माने बिजली। यहाँ रोशनी को बिजली का प्रतीक मान लिया गया है। वह रोशनी जो ख्वाबों से सजी है, जो सितारों को ज़मीं पर लाकर अँधेरे दूर कर सकती है। रोशनी को सितारों के सदृश बताकर उसमें अनेक व्यंजनाएँ सी उत्पन्न की गई हैं। सपनों से जुड़ी होकर उसकी अर्थवत्ता कई गुना बढ़ जाती है। यह विज्ञापन मात्र उत्पाद से बढ़कर कंपनी की प्रतिष्ठा और देशवासियों की उमंगों से जुड़ जाता है। यहाँ भाषा की चित्रात्मक शक्ति ही उसमें ऐसी संभावनाएँ जगा रही है।

बिंब का संबंध चित्रात्मकता से भी है और ऐन्द्रीयता से भी। कल्पना बिंब की विधायिनी शक्ति है। इसके माध्यम से ही अप्रत्यक्ष संवेदनाओं को प्रत्यक्ष किया जाता है। विज्ञापन की भाषा में दृश्य बिंबो की भरमार है। विशेषतः रेडियो विज्ञापनों की प्रस्तुति ऐसी होती है जिससे वह पूरा दृश्य सजीव हो जाए। ऐसे स्थलों पर चित्रात्मक के साथ-साथ बिंबात्मकता का भी उपयोग किया जाता है। कुछ ऐन्द्रीय बिंबों के उदाहरण इस प्रकार हैं -

क्या स्वाद क्या महक कैसी चटपटी चहक (एम.डी.एच. मसाले)

यहाँ स्वाद एवं गंध बिंब है।

मैं नारी रेशम रेशम (स्पर्श बिंब का उदाहरण है)

रेशम को छूने से जैसा अहसास होता है वैसा ही अनुभव स्त्री की त्वचा में जगाता है।

स्त्री सौन्दर्य के जितने भी ऐसे बिंब हैं जहाँ उसके मुलायम कोमल होने की बात की गई है वह समय के साथ-साथ, बार-बार प्रयुक्त होने के कारण प्रतीक बन जाते हैं। काले-घने बाल, गोरापन ये सब स्त्री सौन्दर्य के प्रतीक हैं। विज्ञापन में साधारणतः ऐसे प्रतीकों का बहुत प्रयोग होता है। इनका लाभ यह है कि इनके संकेत से ही उत्पाद की गुणवत्ता के विषय में पता चल जाता है। इनका नुकसान भी है कि इनके अत्याधिक प्रयोग से उसका नयापन खत्म हो जाता है और रूढ़ होने के बाद वे किसी का भी ध्यान आकर्षित नहीं करते।

कुछ अलंकारों को भी सादृश्य विधान के अंतर्गत विश्लेषित किया जा सकता है क्योंकि वे प्रस्तुत-अप्रस्तुत की समानता पर टिके हैं (जैसे उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा आदि) किंतु यहाँ उन्हें अगले हिस्से में अलंकरण की कोटि में रखा गया है।

अलंकरण

अलंकार काव्य की शोभा होते हैं। कविता की व्याख्या में उनका विश्लेषण कविता के विविध अर्थ-स्तरों को उजागर करता है। अलंकारों को केवल कविता तक सीमित करना उनकी शक्ति को अनदेखा कर देने के समान है। अलंकरण की प्रक्रिया को पद्य-गद्य दोनों ही जगह शब्द-अर्थ-सौन्दर्य के प्रेरक रूप में ग्रहण किया जा सकता है। विज्ञापन की भाषा में तो इनकी सार्थकता निर्विवाद है। विज्ञापनों में अलंकारों का प्रयोग कैसे किया गया है इसे समझने के लिए हमें एक-एक कर लोकप्रिय अलंकारों को थोड़ा समझना भी पड़ेगा।

अलंकारों की मुख्यतः दो कोटियाँ हैं:- (1) शब्दालंकार (2) अर्थालंकार। शब्दालंकारों का उद्देश्य शब्दों में चमत्कार पैदा करना है जबकि अर्थालंकार अर्थ-सौन्दर्य की व्यंजना करते हैं। शब्दालंकारों में अनुप्रास, पुनरूक्ति विशेष लोकप्रिय हैं।

अनुप्रास अलंकार में किसी वर्ण, शब्द या वाक्यांश की आवृत्ति होती है। अनुप्रास भाषा को श्रुति मधुर बनाता है तभी तो ‘ये दिल माँगे मोर’ पर इतना ज़ोर रहा। विज्ञापन के अनेक उदाहरणों में अनुप्रास की छटा देखी जा सकती है -

‘जियो जी भर के’ (रिवाइटल)
‘छोटे-छोटे छेद भरे सड़न होने से पहले’ (पेप्सोडेंट)
‘सिर्फ़ ज़बान पर लगाम लगाता है हाथ पर नहीं’ (सेन्टर फ्रेश)

पुनरूक्ति - जहाँ अपनी बात को दोहरा कर कहा जाता है। जैसे -

खाए जाओ, खाए जाओ ... यूनाईटेड के गुण गाए जाओ (यूनाइटेड प्रेशर कुकर)

पुनरूक्ति से उत्पाद की निरंतरता तो सिद्ध होती ही है, उसकी लोकप्रियता और विश्वसनीयता भी बढ़ जाती है। विज्ञापन को स्मरणीय बनाने में भी पुनरूक्ति विशेष सहायक होती है। कभी-कभी संगीतात्मकता के अनुरोध पर भी पुनरूक्ति की जाती है, जैसे लिम्का का विज्ञापन -

‘ज़िन्दगी फिर से गाए बूँदों में
बूँदों में, बूँदों में, बूँदों में’

यमक -

एक ही शब्द को जब एक से अधिक बार अलग-अलग अर्थ में प्रयोग किया जाए तब यमक होता है। बैंक ऑफ़ बड़ौदा के विज्ञापन में कहा गया है -

‘छोड़ो लाइन / हो जाओ / ऑनलाइन’

यहाँ इंटरनेट बैंकिंग की अपील के लिए लाइन और ऑनलाइन के लाइन को अलग-अलग अर्थ में रखा गया है। इसी तरह जनसत्ता का विज्ञापन है -

‘सबको ख़बर दे, सबकी ख़बर ले’

अर्थालंकारों में उपमा और रूपक तो विज्ञापन कॉपी लेखकों के विशेष प्रिय हैं।

उपमा में प्रस्तुत की अप्रस्तुत से तुलना की जाती है। विज्ञापनों में उत्पाद को अक्सर किसी अन्य वस्तु या भाव के समान बताया जाता है। कुछ उदाहरणों से यह बात और स्पष्ट हो जाएगी:

1. दूध सी सफेदी निरमा से आए
रंगीन कपड़ा भी खिल-खिल जाए। (निरमा वॉशिंग पाउडर)
2. आप भी पाइप रेशम-सी कोमल त्वचा (विवेल सोप)
3. हाय कुंदन-सी दमकी
हमारी बन्नो (वीको टर्मरिक)

इन सभी उदाहरणों में तुलना का भाव प्रमुख है।

रूपक अलंकार में प्रस्तुत पर अप्रस्तुत का आरोप किया जाता है। यह अभेद की स्थिति है। विज्ञापन में इसके प्रयोग से अभिव्यक्ति और सशक्त हो जाती है। उत्पाद को किसी और के समान न कहकर दूसरे नाम से पुकारा जाता है जिससे उसकी विशेषताएँ स्वतः स्पष्ट हो जाती हैं। जैसे -

1. सुपर निरमा, माई सुपरमैन

(सब दाग हटा देने से निरमा साबुन बन गया बच्चों का सुपरमैन)

2. मच्छरों का यमराज (ऑल आउट)

ऑल आउट के विषय में कुछ और कहने की ज़रूरत ही नहीं जब उसे मच्छरों का यमराज कह दिया गया वह मच्छरों के अंत का सूचक है।

3. मैं नारी रेशम-रेशम

नारी रेशम के समान ही नहीं, वह स्वयं रेशम है।

जैसे समानता दर्शाने से भाषा में चमत्कार उत्पन्न होता है वैसे ही विषमता से भी चमत्कार उत्पन्न होता है। विरोधाभास अलंकार को विज्ञापन की भाषा में खूब अपनाया गया है। विरोधाभास जैसा नाम से स्पष्ट है विरोध का आभास देता है वहाँ वास्तविक विरोध नहीं होता। जैसे -

1) दाग अच्छे हैं (सर्फ़ एक्सेल)
न सर झुका है कभी
न झुकाएँगे कभी (एचडीएफसी लाइफ इंश्योरेन्स)

नकारात्मक वाक्य से सकारात्मक सम्मान भावना की प्रतिष्ठा की जा रही है।

2) अप्रैल की धूप में रजाई का लुत्फ़
जून की गर्मी में चाय का मज़ा (ओनिडा ए.सी.)

3) इस गर्मी में गर्म चाय पीने से ठंडक मिलेगी (ब्रुकबांड ताज़ा ठंडा चाय)

विज्ञापन की अवधारणा अतिशय कथन पर आधारित है। यहाँ बात को इतना बढ़ा-चढ़ाकर कहा जाता है कि बहुत बार वह विश्वसनीयता की सीमा भी लांघ जाता है। अत्युक्ति एवं अतिश्योक्ति ऐसे ही अलंकार हैं जहाँ प्रस्तुति में अतिरंजना के माध्यम से चमत्कार उत्पन्न किया जाता है। विज्ञापनों में खूबसूरती, कपड़ों की धुलाई, गाड़ी की माइलेज आदि को लेकर जो दावे किए जाते हैं, वे अतिरंजनापूर्ण ही होते हैं। जैसे -

1. दर्द मिटाए चुटकी में (हिमानी फास्ट रिलीफ)

2. अब पहले सफ़ेद बाल,

बन गए आख़िरी। (गार्नियर कलर नेचुरल्स)

मानवीकरण -

मानवीय पदार्थां में मानवीय भावनाओं का आरोप ही मानवीकरण है। विज्ञापन यह बखूबी करता है। लगभग सभी उत्पादों का संबंध मानवीय अहसास और भावनाओं से जोड़ दिया जाता है जब उसे मानवीय भंगिमाओं उसके आचार-व्यवहार से जोड़ दिया जाए तो मानवीकरण का सौन्दर्य उत्पन्न हो जाता है। जैसे -

‘क्या आपके बाल भी हँसते खिलखिलाते हैं?’ (अयूर हर्बल शैंपू)

सामान्यतः हँसना खिलखिलाना मनुष्य का धर्म है बालों का नहीं। यहाँ बालों में उसकी व्यंजना कर अपनी बात और प्रभावी ढंग से रखी गई है।

तुकान्तता

पंक्तियों के अंत में जब एक जैसी ध्वनि पैदा होती है तो उसे तुकान्तता कहते हैं। यह एक तरह का अनुप्रास ही है (अन्त्यानुप्रास)। यह अंत की समध्वनि एक गूँज की तरह मन में बार-बार बजती रहती है। विज्ञापन-संदेश तथा स्लोगनों में तुकान्तता का विशेष महत्व है। तुकान्तता पंक्तियों को स्मरणीय तो बनाती ही है उससे उन्हें संगीत में ढालने में भी सुविधा हो जाती है। तुक का इस्तेमाल कई तरह किया जाता है। कभी-कभी केवल पहली या आखिरी दो पंक्तियों में ही तुक मिलती दिखाई पड़ती है और बाकी सारा विज्ञापन सपाटबयानी की तर्ज़ में प्रस्तुत होता है। जैसे वीको टर्मरिक के विज्ञापन की पहली दो पंक्तियाँ हैं -

"हल्दी के उबटन से तेरा शगुन
हल्दी में समाए हैं सारे ही गुण"

इसके आगे दुल्हन के तैयार होकर आने और उसके इर्द-गिर्द औरतों के हँसने-खिलखिलाने के बीच कुछ संवादात्मक शैली में अगली पंक्तियाँ बोली जाती हैं -

हाय कुंदन सी
हाय कुंदन सी दमकी हमारी बन्नो
रूप की आज रानी बनी है बन्नो

रूप की रानी बनी है गुणकारी हल्की और चंदन से दूसरी-तीसरी पंक्ति में बन्नो शब्द की पुनरावृत्ति से तुकान्तता का आभास होता है लेकिन पहली दो पंक्तियों की अपेक्षा यहाँ वह सौन्दर्य नहीं बन पाया जो तुक मिलने से आता है। यहाँ शैली मुख्यतः संवाद की ही है।

कभी पहली-दूसरी पंक्ति में एक तुक मिलाया जाता है और तीसरी-चौथी में कोई दूसरा जैसे -

आता नहीं है दाढ़ी बनाना
कटे जले तो बोरोप्लस लगाना
अरे बहुत हो रही है जलन
ये लीजिए बोरोप्लस मलहम (बोरोप्लस)

एक अन्य विज्ञापन है जहाँ दो-दो पंक्तियों के तुकान्त जोड़े बनते हैं -

दिल्ली में लोग बातें बहुत करते हैं -
सड़कों की खुदाई
पड़ोसी की लुगाई
जेब की कड़की
मुहल्ले की लड़की
दाल की रेसिपि
दही-भल्ले टिक्की (आइडिया)
दिल्ली में लोग बातें बहुत करते हैं
इसलिए दिल्लीवासियों के लिए आइडिया लाए हैं ....

इस विज्ञापन में 1-2, 3-4, 5-6 पंक्तियों के तुकात्मक जोड़े बनते हैं। कभी-कभी 1-3 तथा 2-4 पंक्ति में भी तुक मिलता है और कभी एक साथ चार, छह पक्तियाँ एक ही शब्द से अंत होती हैं जैसे क्लोज़ अप के विज्ञापन में -

जब हँसने के मौके आते हैं
सब मिल के खिलखिलाते हैं
तब फटफटिया फिर आप चलाते हैं
दुनिया उनकी दीवानी है
जो खुल के हँसते जाते हैं

इसके बाद वॉयस ओवर से संदेश दिया जाता है क्लोज़ अप आपको दे कॉन्फीडेंस खुलकर हँसने का। स्लोगन - ‘हँसो तो खुल के हँसो’ इस विज्ञापन में गीत की पाँच पंक्तियाँ हैं जो सभी - है/हैं - से अंत हो रही हैं। यहाँ तुक मिलाने और संगीत की सृष्टि का अनूठा समंजन है।

विज्ञापन के स्लोगनों में तो तुक मिलाने का पुराना रिवाज़ ही है जो आज भी बेहद लोकप्रिय है -

टेढ़ा है पर मेरा है (कुरकुरे)
भेजा फ्राई तो सेवेन अप ट्राई (सेवेन अप)
टाइड है तो व्हाइट है (टाइड)
थोड़ा और विश करो, डिश करो (डिश टी-वी-)

समानान्तरता

तुक, अनुप्रास, आवृत्ति का एक अन्य रूप भी है जिसे भाषाशास्त्रीय शब्दावली में समानान्तरता कहते हैं। इसका संबंध समध्वनि, अक्षर, शब्द या वाक्यांश की आवृत्ति से है। समानान्तरता विज्ञापन की भाषा को आकर्षक एवं प्रभावशाली बनाती है। यह तुक, अनुप्रास, पुनरावृत्ति के निकट तो है लेकिन मात्र उनका प्रतिरूप ही नहीं है। यहाँ ध्वनि के स्तर पर जो आवृत्ति होती है वह अनुप्रास की भाँति साथ-साथ ही हो, यह आवश्यक नहीं। इसी तरह शब्दों की आवृत्ति भी कभी दो समान या दो विरोधी अर्थ संप्रेषित करने वाले टुकड़ों को साथ रखकर की जाती है। एक ओर यह कथन-भंगिमा से संबद्ध है तो दूसरी ओर उसके आंतरिक विधान से भी जुड़ी हुई है। उक्त विशेषताओं को कुछ उदाहरणों के माध्यम से बेहतर समझा जा सकता है।

ध्वनि समानान्तरता

कैच का कोई मैच नहीं (कैच मसाले)
कलर भी केयर भी (स्ट्रीक्स हेयर कलर)
नक्षत्र - रोशनी का अनंत चक्र (नक्षत्र ज्वैलरी)

यहाँ ध्वनियों में साम्य है जो कथन को पढ़ने में सरस और सुनने में मधुर बनाता है। यह समानान्तरता अनुप्रास से भिन्न है लेकिन प्रभाव में उसके निकट है।

आक्षरिक समानान्तरता

यहाँ अक्षरों की आवृत्ति देखी जा सकती है जैसे -

1. जगाइए बालों में नया रंग
खूबसूरत कॉपर्स के संग! (गार्नियर)
2. अब जहाँ आम बार गलेगा
नया विम बार चलेगा.... (विम बार)
और चलता रहेगा

शाब्दिक समानान्तरता

समान शब्दों की आवृत्ति विशेष उद्देश्य की पूर्ति के लिए की जाती है। उदाहरणार्थ -

1. असली आँवला, डाबर आँवला (डाबर आँवला हेयर ऑयल)
2. सौन्दर्य शृंगार, सौन्दर्य साबुन लक्स से (लक्स साबुन)
3. बाय-बाय सफेद बाल, हैलो सॉफ्रट नेचुरल बाल (गार्नियर कलर नेचुरल)

वाक्यपरक समानान्तरता

समान संरचनापरक वाक्यों की आवृत्ति वाक्यीय समानान्तरता कहलाती है।

1. साठ साल के बूढ़े या साठ साल के जवान (झंडू केसरी जीवन)
2. आज़ादी: निखरती रहे।
मुस्कानें: सँवरती रहें (उत्तर रेलवे)

यहाँ एक ही जैसी वाक्य संरचना है। कभी-कभी छोटे-छोटे वाक्यांशों की आवृत्ति भी वाक्यपरक समानान्तरता को प्रस्तावित करती है। नॉर सूप के विज्ञापन में ऐसा ही किया गया।

‘टम्मी भी ख़ुश, मम्मी भी ख़ुश’

विचलन

रचनात्मक आकर्षण का एक अवयव यदि समानान्तरता है तो दूसरा विचलन। विज्ञापन की भाषा किन्हीं नियमों से बंधी नहीं है। अतः उसके प्रयोग में कई तरह की आज़ादी ली जा सकती है। ये स्वतंत्र प्रयोग उपभोक्ता का ध्यान आकर्षित करते हैं। विचलन भाषा के स्वीकृत व्याकरणिक ढाँचे के बाहर उसकी सर्जनात्मकता तलाशता है। यह विचलन भी समानान्तरता के समान ध्वनि, शब्द एवं वाक्य के स्तर पर हो सकता है।

ध्वनिपरक विचलन

जहाँ ध्वनि के परिवर्तन से अर्थ-चमत्कार उत्पन्न किया जाता है। जैसे -

‘आह से आहा तक’ (मूव क्रीम)

एक ध्वनि के विचलन से अर्थ परिवर्तित हो गया। कभी ध्वनि के विचलन से सौन्दर्य उत्पन्न होता है -

‘उषा है तो आशा है’ (उषा पंखे)

शब्द स्तरीय विचलन

अक्सर नए शब्दों के निर्माण में ऐसे विचलन देखे जा सकते हैं -

रिन की चमकार

चमक और चमत्कार के बीच एक नया शब्द गढ़ लिया गया जो रिन की सप़फ़ेदी को अधिक ज़ोर देकर प्रतिष्ठित करता है।

वाक्यस्तरीय विचलन

कभी संरचना की दृष्टि से तो कभी पदक्रम की दृष्टि से वाक्यों को बदलकर उन्हें नए अर्थ-संदर्भ दिए जाते हैं। ऐसी स्थिति में वाक्यगत भाषिक विचलन विज्ञापन की भाषा को अधिक चुस्त एवं चुटीला बनाता है। प्रायः वाक्यों में एक-न-एक क्रिया का होना आवश्यक माना गया है लेकिन विज्ञापन में भी बहुत से वाक्य ऐसे होते हैं जिनमें क्रिया का प्रयोग नहीं होता। विशेषतः विज्ञापन के स्लोगन तो हमेशा ही क्रियाविहीन वाक्य होते हैं। उदाहरण -

शुद्ध सौम्य लक्स, फिल्मी सितारों का सौन्दर्य साबुन

वाक्यों में पदक्रम बदलकर जो विचलन पैदा किया जाता है वह विशेष आकर्षक है।

औरत के हर रूप को उजागर करे हीरा (इरा डायमंड)

यहाँ हीरा प्रमुख उद्देश्य है फिर भी उसे पहले न रखकर अंत में रखा गया है।

मुहावरे और लोकोक्तियाँ

मुहावरे और लोकोक्तियाँ जीवन का सार हैं। विस्तृत अर्थ संदर्भों को संक्षेप में कहना हो तो मुहावरे और लोकोक्तियाँ भाषा का विशेष साधन बनते हैं। लोकोक्तियाँ प्रायः वहीं प्रयुक्त होती हैं जहाँ लोकभाषा का प्रयोग हो। विज्ञापनों में लोकोक्तियों की अपेक्षा मुहावरों का अधिक प्रयोग हुआ है। मुहावरे विज्ञापन की भाषा में सूत्रात्मकता लाते हैं। बहुत बार प्रचलित मुहावरों की अभिव्यक्ति विज्ञापनों में खूब सुनाई पड़ती है। जैसे - ‘कामयाबी आपके कदम चूमेगी’, ‘आपकी खुशियों में चार चाँद लगाए’, ‘आपकी ज़िन्दगी रोशन कर दे’, ‘आँखों का तारा’ आदि ऐसे वाक्यांश हैं जो एक नहीं, अनेक विज्ञापनों में सुनाई पड़ जाते हैं। प्रसिद्ध विज्ञापनों में मुहावरों की विशिष्ट अभिव्यक्ति के उदाहरण इस प्रकार हैं -

बेटा मन में लड्डू फूटा (कैडबरी शॉट्स)
घर घर का चिराग (लूमिनस इन्वर्टर)
किए कराए पर खाँसी फेर दी (टोरेक्स कफ़ सिरप)

इन उदाहरणों में प्रचलित मुहावरे को विज्ञापन में भली-भाँति प्रयुक्त किया गया है।

विज्ञापन की भाषा नए मुहावरे भी गढ़ती है जो समय के विभिन्न पड़ावों पर अपनी सार्थकता सिद्ध करते हुए देश और पीढ़ियों की आकांक्षाओं का प्रमाण बन जाते हैं। वे सामयिक होकर भी शाश्वत जीवन-सत्यों के वाहक बनते हैं। इन दिनों के विज्ञापनों में जो मुहावरे अत्यंत प्रचलित हुए हैं उनमें मुख्य हैं -

कर लो दुनिया मुट्ठी में (रिलायंस मोबाइल)
डर के आगे जीत है (माउंटेन डियू)
दिल तो जेब में रखा है (सैमसंग गुरु)

भाषा संकर

अर्थ संप्रेषण की सुविधा, मुख-सुख, तो कभी तुक मिलाने के लिए विज्ञापन की भाषा में अनेक भाषाओं से शब्द ग्रहण कर लिए जाते हैं। हिन्दी विज्ञापनों में अंग्रेज़ी की तो भरमार है। शब्द-चयन तथा वाक्य-संरचना दोनों दृष्टियों से अंग्रेज़ी का बेझिझक प्रयोग हो रहा है। सिर्फ़ अंग्रेज़ी के ही नहीं उर्दू, पंजाबी तथा अन्य क्षेत्रीय भाषाओं के शब्द भी निराग्रह भाव से ग्रहण किए जाते हैं। यह भाषा-संकर मानक भाषा के समक्ष एक चुनौती प्रस्तुत करता है। भाषा की शुद्धता के आग्रही सदा इस स्थिति पर चिंता जताते रहे हैं किन्तु यदि खुले मन से सोचा जाए तो विज्ञापन का प्रमुख लक्ष्य संप्रेषण और सिर्फ़ संप्रेषण है। उसके लिए अन्य भाषाओं से शब्द लेकर उन्हें संवादों के साँचे में ढाल लेना भारत जैसे बहुभाषी देश में भाषा की शब्द-संपदा को समृद्ध ही करता है। कोका कोला के आमिर ख़ान वाले विज्ञापनों में हिन्दी की मूल संरचना में पंजाबी, बांग्ला, दक्खिनी, नेपाली आदि के प्रयोग काफी लोकप्रिय रहे। ‘गन्ने दे खेत विच टमाटर किस तरह’ जैसी पंक्तियाँ ‘यारों के टशन’ को बखूबी बयान करती थीं। ऐसे शब्दों, फिकरों के आ जाने से भाषा के गुणात्मक विकास पर कोई आघात पहुँचा हो, ऐसा नहीं लगता। डॉ- सुधीश पचौरी तो अपनी पुस्तक ‘जनसंचार माध्यमः भाषा और साहित्य’ में मीडिया की भाषा पर टिप्पणी करते हुए यहाँ तक कहते हैं - "वहाँ हमेशा एक भाषा में नाना भाषाओं का मिक्स मौजूद रहता है। हम मुस्तकिल तौर पर भाषाओं में रहते हैं। सिर्फ़ ‘भाषा में’ नहीं रहते....’

भारतीय परिदृश्य में अधिकांश विज्ञापनों में हिन्दी-अंग्रेज़ी का मिश्रण हुआ है। उसका मुख्य कारण यह भी है कि यहाँ के शहरों में हिन्दी और अंग्रेज़ी का बराबर प्रभुत्व है। यूँ भी विज्ञापन की सफलता लक्षित उपभोक्ता तक पहुँचने में है। पहले पहल मीडिया के तमाम साधनों पर अंग्रेज़ी बोलने वालों का कब्ज़ा था और वही लोग खरीददार भी थे पर जैसे-जैसे बाज़ार फैलता गया उपभोक्ता भी बढ़ते गए। अब यह बाज़ार शहरों से निकलकर दूर-दराज़ के इलाकों तक फैल गया। इन उपभोक्ताओं से इनकी भाषा में बात करना ज़रूरी था। इस नाते अधिकांश जनसंख्या की भाषा होने के कारण विज्ञापनों की भाषा हिन्दी हो गई। दूसरी तरफ बड़े शहरों में अंग्रेज़ी बोलने वालों की संख्या भी काफी अधिक थी तो दोनों उपभोक्ता वर्गों को साथ-साथ लक्षित करते हुए विज्ञापन की भाषा में भाषा-संकर की यह स्थिति उत्पन्न हो गई।

हमारे सामने प्रमुख प्रश्न यह है कि विज्ञापन की भाषा में भाषा-संकर किस-किस रूप में लक्षित होता है तथा इसे और अधिक सृजनात्मक ढंग से कैसे इस्तेमाल किया जा सकता है। भाषा-संकर की मुख्यतः दो स्थितियाँ दिखाई पड़ती हैं। एक जहाँ एक ही पंक्ति में एक भाषा के बीच दूसरी भाषा के शब्द या वाक्य-विन्यास शामिल हो जाते हैं। इसे भाषाशास्त्र में कोड मिश्रण कहा जाता है।

कोड मिश्रण में एक भाषा की भाषिक इकाइयाँ दूसरी भाषिक इकाइयों में स्थानान्तरित हो जाती हैं। इस स्थानान्तरण से एक नए भाषा कोड का जन्म होता है। उदार आर्थिक नीतियों से बाज़ार को जो प्रोत्साहन मिला उससे विज्ञापनों में हिन्दी-अंग्रेज़ी का कोड मिश्रण काफी लोकप्रिय हुआ है। कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं -

हंगरी क्या?
खुशियों की होम डिलीवरी (दोमिनो पिज्ज़ा)
फ्रेशनैस का नया सुर (हमदर्द रूहअफ़ज़ा)
हीरो होण्डा धक धक गो (हीरो होण्डा)
यही है राइट चॉयस बेबी आहा! (पेप्सी)
नवरत्न तेल ठंडा-ठंडा कूल कूल (नवरत्न तेल)
मिर्ची सुनने वाले ऑलवेज़ खुश (रेडियो मिर्ची)

उक्त उदाहरणों में स्लोगन में कोड मिश्रण किया गया है। कुछ विज्ञापन ऐसे भी होते हैं जहाँ पूरे विज्ञापन में कोड मिश्रण का इस्तेमाल किया जाता है। डाबर रेड टूथपेस्ट के विज्ञापन में एक कक्षा में टीचर बच्चों को दाँतों की समस्या पर पढ़ाते हुए समझाती है -

ब्रश करने के बाद भी दाँतों में प्रॉब्लम
इसका जवाब है नेचर के पास
इसके लिए हमारे साइंटिस्ट ने बनाया
लौंग, पुदीना और तोमर युक्त
डाबर रेड टूथपेस्ट
जो दे दाँतों को नेचुरल प्रोटेक्शन
नेचर और साइंस यानी
जर्मस् और ब्लीडिंग गमस् रहें दूर
डाबर रेड टूथपेस्ट
और प्रॉब्लम चल हट

इस उदाहरण से बच्चों को ठीक से समझाने के लिए मिली-जुली भाषा का प्रयोग किया गया है। मदर डेरी दूध का एक संगीतात्मक विज्ञापन बहुत लोकप्रिय हुआ था जिसका दूध की विशेषताएँ बताते हुए बच्चों को दूध पीने के लिए मज़ेदार ढंग से प्रेरित करना था। उसमें तुक और संगीत के लिए हिन्दी-अंग्रेज़ी का कोड मिश्रण किया गया -

दूध दूध दूध
पियो ग्लासफुल दूध
दूध है मस्ती एवरी सीज़न
पियो दूध फॉर हेल्दी रीज़न
रहोगे सदा फिट एंड फाइन
जिओगो साल नाइनटी नाइन

कोड मिश्रण के अतिरिक्त भाषा संकर की दूसरी स्थिति कोड अंतरण की है। कोड अंतरण भाषाओं का प्रकार्यात्मक संदर्भ है। एक से अधिक भाषाएँ जानने वाला व्यक्ति एक ही संदर्भ में दो या अधिक भाषायी कोडों का इस्तेमाल करता है। कोड अंतरण स्थिति सापेक्ष, प्रकार्य सापेक्ष अथवा व्यक्ति सापेक्ष हो सकता है। साधारण भाषा में जब आप दो भाषाओं के शब्दों का मिला-जुला प्रयोग न करें लेकिन हिन्दी में बात करते हुए फिर किसी अन्य भाषा में बात करने लगें यानी एक भाषा के कोड से दूसरी भाषा में स्विच ओवर कर जाएँ। विज्ञापनों में यह स्थिति प्रायः इस रूप में देखी जाती है जहाँ पूरा विज्ञापन एक भाषा में है और अंतिम स्लोगन दूसरी भाषा में। हिन्दी अंग्रेज़ी के संदर्भ में प्रायः हिन्दी विज्ञापनों के स्लोगन अंग्रेज़ी में ही होते हैं, जैसे -

1) ट्रस्ट पिंक फॉरगेट स्टेन्स (वैनिश पाउडर)
2) सनफ्रलेम जस्ट वॉट यू वॉन्टेड (सन फ्रलेम गैस चूल्हा)
3) द ओनली इफेक्ट इट लीव्ज़ बिहाइंड इज़ ए समाइल (अयूर हर्बल शैंपू)

आई सी आई सी आई लाइफ इंश्योरेन्स के विज्ञापन में इससे उलटी स्थिति भी देखी जा सकती है। उनकी टैगलाइन है ‘जीते रहो’। उनके अंग्रेज़ी विज्ञापनों के नीचे भी यही टैगलाइन चलती है। इंडिया बुल्स के होम लोन के सभी विज्ञापनों में ‘घर आ जाओ’ की अपील है। अंग्रेज़ी विज्ञापनों में भी यही स्लोगन रोमन लिपि में लिखा रहता है।

कभी-कभी एक ही विज्ञापन में दो पंक्तियों के बीच भी कोड अंतरण किया जा सकता है। जैसे -

1. सिप द कॉफी, लिक द क्रीम
ब्रू से होती हैं खुशियाँ शुरू (ब्रू कॉफी)
2. आम की रसीली गोली
एन्जॉय वेरी सलोली (पारले मैंगोबाइट)

भाषा-संकर की यह सभी स्थितियाँ तब सफल होती हैं जब भाषा के स्वतंत्र ढाँचे में व्यवधान उपस्थित नहीं करतीं बल्कि मूल भाषा का अंग बनकर उसमें रच-बस जाती हैं। विज्ञापन भाषा के इस रूप का भाषाओं को निकट लाने और भिन्न भाषा-भाषियों के बीच दूसरी भाषाओं के प्रति स्वीकारात्मक दृष्टिकोण बनाने में महत्वपूर्ण योगदान है।

उपरोक्त अंश में भाषा की सृजनात्मकता को विभिन्न भाषिक अवयवों, विविध लेखन शैलियों तथा उनके प्रयोग को समझने-समझाने की कोशिश की गई है। हालाँकि यह भी अपने-आप में संपूर्ण एवं अंतिम नहीं है। जैसे सृजनात्मकता की कोई सीमाएँ नहीं होती वैसे ही भाषा-प्रयोग को भी सीमित ढाँचों में रूढ़ बद्ध नहीं किया जा सकता। उनकी गतिशीलता ही उनकी रचनात्मकता का प्रमाण है। विज्ञापन की भाषा नित नए प्रयोग करते हुए विकसित हो रही है। अपने सीमांतों को स्वयं ही तोड़ते हुए नई दिशाएँ तलाश रही है।


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