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ISSN 2292-9754

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12.06.2014


ख़्वाब

 मैंने ख़्वाब बहुत देखे थे
कुछ सच थे, कुछ अनदेखे थे

कुछ पुड़िया में बंद पड़े थे
कुछ गुड़िया के साथ जुड़े थे
कुछ उड़ते फिरते तितली से
कुछ छोटे, कुछ बहुत बड़े थे

कुछ रंगीन बटन लगते थे
झूले से भावन लगते थे
साँझ जले चूल्हे की ख़ुशबू
जैसे वो पावन लगते थे

कुछ गिर जाते आँसू बन कर
जैसे बहती बर्फ पिघलकर
कभी झिझकते, कभी सिसकते
कभी ललकते, मचल-मचल कर

कुछ माँ का आँचल लगते थे
पापा का संबल लगते थे
मुश्किल की तपती गर्मी में
बारिश का बादल लगते थे

जाने कब मैं बड़ी हो गई
लड़की मैं फुलझड़ी हो गई
माँ की चिंता, पिता का बोझा
दोराहे पर खड़ी हो गई

छोड़ किताबों के सपनों को
तोड़ के रिश्तों को, अपनों को
मैं साजन के द्वार आ गई
ख़ुशियों का संसार पा गई

जब बच्चों को पाल रही थी
माँ की ममता साल रही थी
उनके ऊपर मैं थी मरती
तब भी सपने देखा करती

कुछ सपने तब गुब्बारे से,
उड़ते-उड़ते कहीं खो गए
कुछ सपने बच्चों के जीवन
से जुड़कर के पूर्ण हो गए

मैं अब भी सपने बुनती हूँ
बिखरी कलियों को चुनती हूँ
लोगों से जब भी मिलती हूँ
उनकी व्यथा कथा सुनती हूँ

अब मेरे सपने कहते हैं
दुनिया में एक क्रांति आए
भय, आतंक, युद्ध मिट जाए
सबके मन में शांति छाए

आदर्शों की बात नहीं हैं
सबके मन की बात यही है
सच तो ये है मित्रों सारी
ख़ुशियों की सौगात यही है

आओ ऐसे ख़्वाब सजाएँ
दुनिया को फिर स्वर्ग बनाएँ
कुछ तो सपने होंगे पूरे
क्या शिकवा कुछ रहे अधूरे


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