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11.29.2008
 

छ्ठवाँ तत्त्व
रेखा मैत्र


कैसे कहती मैं तुम्हें
ये देह पाँच तत्त्वों से बनी है
यए बहस का मुद्दा नहीं है
अपने-अपने तज़ुर्बे की कहानी है!

मैंने अक्सर, जिन स्थितियों से
ख़ुद को गुज़रते पाया है
हादसे के बाद स्वयं को टटोला है
कहीं से टूटी-फूटी नहीं
जब कि मुझे मालूम है
तुममें से बहुतेरे
उन रास्तों से लौटते
अपनी किर्चियाँ बटोरते
मिले हैं मुझे!

तब मैं उस प्रभु की
शुक्रगुज़ार हो लेती हूँ
जो उसने मेरी मिट्टी में
पत्थर कुछ ज़्यादा ही
मिला दिए हैं
ताकि मुझमें मज़बूती बनी रहे!


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