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09.30.2007
 
बनारस : दो शब्दचित्र
(दो)

रवीन्द्र प्रभात

(दो)

करतालों की जगह
बजने लगा है पाखंड

अंधविश्वास-
रूढ़ियों को कंधे पर लटकाए
सीढ़ियाँ चढ़ रहा है चट्ट-चट्ट

लज्जित हैं सुबह की किरनें

खंड- खंड तोता रतन्त यजमान लुभाते आख्यान
एक अखंड मु्जरा
एक तेलौस मेज़ पर
तले हुए नाश्ते के समान फैला पश्चात्य
सुबह-ए-बनारस !



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