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ISSN 2292-9754

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01.23.2019


पाठ्यक्रम में प्रेमचंद: अनौपचारिक शिक्षण के मेरे कुछ अनुभव

कुछ दिनों पूर्व फ़ेसबुक पर 7 साल पुरानी अपनी ही पोस्ट को देखा जिसमें कहानी "गुल्ली-डण्डा" का नाट्य मंचन बच्चों से करवा कर हमने हिंदी के प्रख्यात साहित्यकार मुंशी प्रेमचन्दजी को याद किया था। अनायास ही एक हूक फिर से जाग गई और उनकी जयंती पर श्रद्धा-सुमन अर्पित करने की कामना के वशीभूत मैंने सोचा कि बच्चों का वर्तमान साहित्यकारों से संवाद कराना चाहिए। मैंने तुरन्त अपने हाडोती अंचल के वरिष्ठ साहित्यकार अम्बिकादत्त चतुर्वेदी और प्रख्यात व्यंगकार अतुल चतुर्वेदी से चर्चा की, जिन्होंने सहज ही इस प्रयोजन के लिए अपनी स्वीकृति प्रदान की। मुझे सुखद संतुष्टि अनुभूत हुई।

विद्यालय से औपचारिक अनुमति प्राप्ति के बाद अपने रंगमित्र शरीफ़ नादान से इस पर गहन चर्चा की तो निष्कर्ष रूप में यह तय हुआ कि संवाद से पूर्व बच्चे प्रेमचंदजी को पढ़ें। मेरा सदा से मानना था कि पाठ्यक्रम में उपलब्ध प्रेमचंदजी की कहानियों को नाट्यीकरण प्रक्रियाओं पर आधारित शिक्षण के अनौपचारिक तरीक़े से साझा किया जाए ताकि बच्चों में उनके साहित्य के प्रति समझ विकसित हो सके, अतः कार्यशाला योजना उसी अनुसार तय हुई-

राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसन्धान और प्रशिक्षण परिषद् की हिंदी पाठ्य-पुस्तक -
कक्षा- VI से "नादान दोस्त" (28.7.18)
कक्षा- IX से "दो बैलों की कथा" (29.7.18)
कक्षा- XI से "नमक का दारोगा" (30.7.18)
बच्चों से अतिथि-साहित्यकारों का संवाद-
सांय 07 बजे (31.07.18)
संवाद स्थल- भुवनेश बाल विद्यालय, कोटा

पहला दिन -

नादान दोस्त - कक्षा-VI के पाठ्यक्रम में प्रेमचंद की कहानी "नादान दोस्त" यूँ तो पूर्व में भी कई बार पढ़ एवं पढ़ा चुका हूँ, किन्तु कार्यशाला के अंतर्गत इस पाठ के शिक्षण की अनौपचारिक प्रक्रिया में आनन्द की जो प्राप्ति हुई उसे शब्दों में बयां कर पाना मुश्किल काम है। छात्रा तनुराधा ने कहानी का मर्म समझते हुए अपने अनुभव कुछ यूँ साझा किए कि मेरे घर पर जूतों के डिब्बे में चिड़िया ने अंडे दिए थे... जब वो चूजे थे तो हम उनको झूला झुलाते थे। छात्र पार्थ खारोल ने लगभग रुआँसा हो कर बताया “मेरे हाथ से भी एक बार चिड़िया का अंडा गिर गया था।” यह बताते हुवे उसकी आँखें डबडबा गईं। छात्रा अन्नू ने बताया कि “मेरी मेम चिड़िया को दाने डालती है, मुझे बहुत अच्छा लगता है।” ऐसे ही और भी बहुत से बच्चों ने अपने अनुभव समूह में साझा किए। प्रेमचंद जी ने बालमनोविज्ञान को कितना गहरे से परखते हुए इस प्रकार की कहानी की रचना की, यह मुझे सहज ही अहसास हुआ। एक बच्चे का बड़ी मासूमियत से कहना था, “जरूर ये प्रेमचंद के बचपन के किसी नादान दोस्त की सच्ची घटना थी।” इस कार्यशाला के माध्यम से एक नए क़िस्म की अनुभूति के लिए मुंशी जी को शत-शत नमन।

दूसरा दिन –

दो बैलों की कथा - “जानवरों में गधा सबसे ज्यादा बुद्धिहीन समझा जाता है। हम जब किसी आदमी को पहले दर्जे का बेवकूफ कहना चाहते हैं, तो उसे गधा कहते हैं। गधा सचमुच बेवकूफ है, या उसके सीधेपन, उसकी निरापद सहिष्णुता ने उसे यह पदवी दे दी है, इसका निश्चय नहीं किया जा सकता। जितना चाहे गरीब को मारो, चाहे जैसी खराब, सड़ी हुई घास सामने डाल दो, उसके चेहरे पर कभी असंतोष की छाया भी न दिखाई देगी। वैशाख में चाहे एकाध बार कुलेल कर लेता हो, पर हमने तो उसे कभी खुश होते नहीं देखा। उसके चेहरे पर एक स्थायी विषाद स्थायी रूप से छाया रहता है। कदाचित सीधापन संसार के लिए उपयुक्त नहीं है” मुंशी जी के उक्त दर्शन भाव उनकी इस कहानी के प्रारंभ में ही ग़ज़ब की पटकथा का निर्माण करते हैं जो पाठकों के समक्ष उसी सहजता से पहुँचते भी हैं। बच्चे जानवरों के मनोभावों को सहज ही समझ पाए और उनकी पारिस्थितिक मनोदशाओं का खाका अपने बाल-मस्तक पर उतार पाए। कार्यशाला में कक्षा-9वीं के बच्चों के साथ साझा की गई इस कहानी को समझने और उस पर मंथन करने का सामूहिक प्रयास किया गया। कहानी की सुंदरता के बारे में कुछ भी कहने की आवश्यकता महसूस नहीं हो रही, महसूस हुई तो अपने अंदर बगावती तेवर में जलती मशाल की मीठी सी तपिश। यही सलाह है कि सभी यह कहानी पढ़ें और प्रेमचंद जी को सादर नमन करें, गूढ़ मनोदशा को सरल भाव से प्रस्तुत करने की उनकी सच्ची कला के लिए।

तीसरा दिन –

नमक का दारोगा - "ऐसा काम ढूंढना जहाँ कुछ ऊपरी आय हो। मासिक वेतन तो पूर्णमासी का चाँद है जो एक दिन दिखाई देता है और घटते घटते लुप्त हो जाता है। ऊपरी आय बहता हुआ स्रोत है जिससे सदैव प्यास बुझती है।" समाज को आईना दिखाती इस कहानी को आज कक्षा XI के बच्चों के साथ समझने का प्रयास कार्यशाला के दरम्यान किया गया। बच्चों ने कर्तव्य-परायणता के प्रतिमान, कहानी के नायक बंसीधर की ईमानदारी को व्यवस्था में उपस्थित आलोपीदीनों के तराजू पर तौलकर देखा। वर्तमान व्यवस्था में इस कहानी की प्रासंगिकता और अधिक बढ़ जाती है, जब हम अपने समाज और उसमें व्याप्त भ्रष्टाचार को विविध रूपों में देखते हैं। कहानी बाँचने, और उस पर परिचर्चा में अत्यधिक आनन्द आया, ऐसा बच्चों का फ़ीडबैक था।  बच्चों को कहानियों पर एक साझा किन्तु विस्तृत समझ बनाते देख मुझे भी बड़ी प्रसन्नता अनुभूत हुई।  प्रेमचंद जी को एक बार पुनः नमन।

चौथा दिन -

कार्यशाला के चौथे एवं आख़िरी दिन अतिथि साहित्यकारों के समक्ष पाठ्यक्रम में उपलब्ध प्रेमचंद जी की उक्त कहानियों के सौंदर्य भाव, सम्वेदनाओं, मानवीय मूल्यों, वर्तमान प्रासंगिकता और कहानी के तत्कालीन मूल को समझने का प्रयास किया गया। बच्चों ने जहाँ कहानी के इर्दगिर्द अपने जीवन को पाया और अपने जीवन की घटनाएँ बयां की वहीं इस अनौपचारिक कार्यशाला के आख़िरी दिन अतिथि-साहित्यकारों अम्बिकादत्त चतुर्वेदी एवं अतुल चतुर्वेदी ने भी अपने अनुभव पूरी सार्थकता के साथ बच्चों से साझा किये।

इस चार दिवसीय कार्यशाला का मुकम्मल समापन औपचारिक तरीके से हुआ, अतिथि साहित्यकारों, बच्चों के साथ ही मैंने भी मुंशी जी के प्रति अपने विचारों को श्रद्धा सुमन के रूप में उनकी तस्वीर के समक्ष अर्पित कर दिए।

और इस प्रकार पाठ्यक्रम में मुंशी जी को पढ़ने-पढ़ाने की एक मज़ेदार प्रकिया का निर्माण हुआ, जो सतत जारी रहेगी, और हम प्रेमचंद जी को पढ़ते रहेंगे, पढ़ाते रहेंगे|


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