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ISSN 2292-9754

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10.08.2014


एक कविता-५

एक रात उतरती है
पाताल के कोख से
आस के बसेरे में
जागते समय का एक सपना काँपता है
क्षितिज के उस पार
पहर का पहिया घूमता है
एक चमरौन्धी चप्पल पहना बूढा आदमी
हाथ में लाठी लिए
आँखों पर गोल सा पुराने ढंग का चश्मा लगाये
हवा के रुख के विपरीत चलने का साहस करता है
उसने पढ़ा सुना है
सत्य जीतता है
भोर के वक़्त किसी ने उसे गोली मार दी
बाज़ार के चौराहे पर
सूरज के उगने से पहले का संक्रमण काल
दिल के सुराख़ से रिसते खून की धार को
कुछ देर देख रहे हैं कुछ तमाशबीन
कानाफूसी भी होती है
ये तो होना ही था इस पागल के साथ
साहब को ख़िलाफ़त नहीं
नारे रैलियों और वोट के लिए
भीड़ पसंद है
प्रशस्ति गायन के लिए कुछ प्रचारक
बस
देखो अब शरीर अकड़ कर शिथिल पड़ गया
मर गया शायद
चलो भाई भीड़ हटाओ
अभी म्युन्सिप्लिटी की गाड़ी
इस लावारिस मुर्दे को उठाने आएगी
हमें अपनी रोटी कपडा मकान की चिंता है
बाज़ार की भीड़ बाज़ार में खो गयी
पीठ पर बस्ता सँभालता सहमा सा बच्चा
हाथ में झाड़ू लिए खामोश खड़ा देख रहा है मुर्दे को
आज स्कूल में सफाई की क्लास है
आज गांधी जयंती है


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