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ISSN 2292-9754

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10.08.2014


एक कविता-४

ओ आँच
मुझे अपना हाथ दो
अपने फैले हुए दर्द के पाताल से
मुझे चाहिए
तुम्हारी कठोर आवाज़
तुम्हारी बिंधी हुई आँखें
आओ
अपने दर्द दफ़न कर दो
जला दो अपनी ख़ामोशी
आओ
गढ़ने हैं अपने लिए प्याले
जिससे हम अपनी प्यास बुझा सकें
यहाँ अपने पंजों से अंधे आकाश का पानी पी रहे हैं लोग
यहाँ अपनी टाँगों से गूँगी धरती का दामन ढाँप रहे हैं लोग
आओ
कुछ खेती योग्य धरती बचा लें
कुछ फसलों को पानी पिला दें
कुछ चरवाहों के गीत जिला दें
कुछ बुनकरों के रेशम सजा दें
जिससे
ज़िंदगी अपने मौत के मंज़िल पर जाने से पहले
कुछ पल यहाँ विश्राम कर सके


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