अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
10.08.2014


एक कविता-३

एक रिश्ता जो अपना प्रतिदान नहीं माँगता
पाँव की बिवाईयाँ
चेहरे की झुर्रियाँ
माथे की लकीरों पर मुकुट
चमकते सफ़ेद केश-रत्न
अपना प्रतिदान नहीं माँगते
उनकी रूहानी आवाज़ की ख़ामोश कशिश
कहती - सुनाती है
उसकी संघर्षमय जीवनगाथा
उसकी आँखों के समंदरी पन्नों में
युगों-युगों का ऐतिहासिक साहित्य
चम् चम् चमकता है
मोती सा
जेठ की जलती दुपहरी
सूनी सी पगडण्डी के उस पार
मरीचिका के जलमंडल
वो ठूँठ सा मरियल बबूल
बाबा बरगद ने
भूरी दाढ़ी में झूला झुलाते
अपने निर्गुणी लोरी में
सुनाया था मुझे एक दिन
उसके अपाठ्य छंद
भाव बोध
और
अविस्मरणीय घटनाएँ
क्यूँकि वही पढ़ सकता था
उसके अक्षर शब्द और लिपी
जोड़ों का दर्द रोवाँ रोवाँ कंपा देता है
ज्ञान इन्द्रियाँ भी अब साथ छोड़ने पर आतुर हैं
पर फिर भी वो दानी ख़ुद को होम कर
अपने बाद की पीढ़ियों के लिए
सब कुछ जुटा जाने को तत्पर हैं
हड्डियों का ढाँचा सा चलता एक साया
अपना प्रतिदान नहीं माँगता


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें