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ISSN 2292-9754

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10.08.2014


एक कविता-२

जिस घर में मैं रहता हूँ
उसके मालिक का नाम मौत है
घर के दरो-दीवार कोना-कोना
उसी के कब्ज़े में है
यहाँ की हवा...ख़ुशबू...रंग रोगन
सब कुछ

कल मैंने अपनी महबूबा से पूछा
हम ये घर छोड़कर कहीं और क्यूँ नहीं चलते
ऐसी जगह जहाँ मौत का साया न हो
जहाँ देवदार के पेड़ों से आती भीनी ख़ुशबू में
कदम्ब के पेड़ पर बैठा मैं बंसी बजाऊँगा
और तुम
गुलाबों की ताज़गी लिए
आम के पेड़ों में झूले झूलना
जहाँ
सूरजमुखी के खेत
और
गेहूँ की बालियाँ
हमारा स्वागत करेंगी.

मेरी महबूबा ने मुझे आउटडेटिड और किताबी कहते हुए कहा
तुम निरे बुद्धू हो
बौड़म
ऐसी जगह इस धरती पर कहीं नहीं है
पूरी बस्ती का मालिक मौत है
ओ मेरे प्यारे फ़ियान्सी
अपने इस ओल्ड फ़ैशंड रोमांटिसिज़्म से बाहर आओ
क्यूँकि दुनिया पोस्टमॉडर्न हो गयी है
हम इसी बस्ती के इसी घर में रहेंगे
क्यूँकि सब घर एक जैसे हैं
हम मौत से लड़ते हुए
मुहब्बत की नयी परिभाषा गढ़ेंगे

उसकी ये व्याख्या सुन
पहली बार मुझे एहसास हुआ
सच में
मेरी महबूबा मुझसे आगे की बात सोचती है


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