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ISSN 2292-9754

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10.08.2014


एक कविता-१

दूर कहीं एक सन्नाटे का संगीत है
जो हर वक़्त मेरी कानों में गूँजता रहता है
चाहता हूँ की वो मेरे कानों से उतर कर
मेरी साँसों से होते हुए
मेरी धमनियों में उतर आये...
एक अतृप्त सा अनुगूँज है ये
पृथ्वी के विशाल होंठ खुले हैं
काश कोई एक बूँद उसकी प्यासी आत्मा को सुकून दे जाये
रेल की पटरियों पर दौड़ती गाड़ियाँ
यूनिवर्सिटी की सीढ़ियाँ चढ़ते पाँव ठिठक जाते हैं
नदी का विस्तार अपनी गहराई से सीने में दफ़न हो जाता है
आसमान में लाली उभरी है
अपने यौवन के उफान में
ये तेरा क्षणिक साहचर्य
मीलों पैदल चलने का साहस दे जाता है....
हाँ ये सच है कि कोई चमचमाती कार के
एयर कंडीशनी परफ़्यूम में नहाता धरती का सीना लाँघ रहा है
कोई फुटपाथ पर सोता
उसकी गाड़ियों के शोर में गाँव के पीपल के छाँव में
अपने लिए एक आशियाने के न पूरे होने वाले सपने बुनता
तुम्हारी गाड़ियों के पहिये के नीचे कुचले जाने को अभिशप्त है...
पर फिर भी
हर सुबह
वो तुम्हारी काँच की बिल्डिंग के शीशे में अपने बाल सँवारता
तुम्हारी नयी इमारत की नीव का ईंट रखता है
सरसों के तेल एक अदद हरी मिर्च और नमक के साथ सूखी रोटी खाता
अपना सारा श्रम तुम्हें होम कर देता है....
क्या ये सच नहीं है कि उसके पसीने से तुम्हारी गाड़ियों का पेट्रोल बनता है
अपनी इच्छाओं के मोहपाश के आवरण में जकड़े तुम
कहीं एक डर समाया है तुम्हारे भीतर
साम्राज्य के छीन जाने का
इसीलिए
हर बार तुम मुझे रौंदने की कोशिश करते हो
तुम कहते हो प्रतिभा का इम्तहान है
जो पास करेगा
वही सिकंदर कहलायेगा
मुझे बताओ
इम्तहान के लिए घर से निकलते हुए
कभी बीमार माँ के लिए दवा
घर सँभालती बहन की गैस और राशन
की अनुनय सी माँग का सामना किया है तुमने
इम्तहान के पेपर लिखते हुए
कभी तुम्हें
माँ का खाँसता हुआ लाल चेहरा
जवान होती बहन की शादी की चिंता की तस्वीर उभरी है
प्रायोजित समाचारों के भीड़ के बीच
टीवी पर नीचे की लिखी पट्टी पर एक ख़बर लकीर की तरह उभरी थी
तुम्हारा ध्यान भी उस पर नहीं गया होगा
जब एक घनी अँधेरी रात में
पानी के उस पार से
कुछ लोग अचानक
हाथ में घातक हथियार लिए गाँव आये थे
उस आधे घंटे के समय ने
जब सर कटे नग्न अधजली लाशों का देश बना दिया था मेरे गाँव को
समय के इस बँटवारे ने दुनिया बाँट दी थी
हर दिन कोई अपनी नंगी पिपाशा के उबाल में
धरती को रौंदता है
मृत्यु के दरवाज़े के इस पार से उस पार तक
यूनिवर्सिटी गेट पर कभी
पुलिस की लाठियाँ खाईं हैं
रेप पीड़िता और अधजली लाशों के हक़ ली लड़ाई लड़ते
नदी के कछार से आती जाड़े की ठंढी हवा
हडियों के पोर-पोर में समा जाती है सर्दी की टीस
यातनागृह के दर्द का इतिहास पढ़कर नहीं
महसूस कर जाना है मैंने
फिर भी मैं तो मैं हूँ
मौसम के थपेड़े खाता
फिर फिर खड़ा हो जाता हूँ तुम्हारे सामने एक चुनौती बनकर
क्यूँकि...
मैं तो मैं हूँ.....
धरती और प्रकृति के संयोग से जन्मा एक जीव
एक निमित्तमात्र जीव


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