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12.22.2007
 

मुद्दतों से वो आईना दिखाते रहे
रविशंकर श्रीवास्तव ‘रतलामी’


मुद्दतों से वो आईना दिखाते रहे
हम ख़ुद से ख़ुद को छिपाते रहे।

दूसरों की रोशिनियाँ देख देख के
आशियाना अपना ही जलाते रहे।

कहाँ तो चल दिया सारा ज़माना
हम खिचड़ी अपनी बैठे पकाते रहे।

यूँ दर्द तो है दिल में बहुत मगर
दुनिया को गुदगुदाते हँसाते रहे।

कभी तो उठेगी हूक दिल में रवि
यही सोच कर ग़ज़लें सुनाते रहे।

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