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ISSN 2292-9754

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04.07.2017


भीष्म साहनी के साहित्य में वैचारिक चिंतन

मूर्धन्य नाटककार, कथाकार भीष्म साहनी का जन्म 8 अगस्त सन 1915 को रावलपिंडी (पाकिस्तान) में हुआ था। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा घर से ही आरम्भ हुई और वहीँ से उन्होंने हिंदी एवं संस्कृत का अक्षर ज्ञान सीखा। उसके बाद गवर्नमेंट कॉलेज, लाहौर से अंग्रेज़ी साहित्य में एम.ए. की उपाधि प्राप्त की। अपनी पढ़ाई को जारी रखते हुए फिर उन्होंने पंजाब विश्वविद्यालय से डॉक्टर ऑफ़ फिलासफी की डिग्री हासिल की। तत्पश्चात उन्होंने अम्बाला के एक कॉलेज में अध्यापन कार्य किया। उसके बाद कुछ दिन तक खालसा कॉलेज अमृतसर में पढ़ाया, बाद में दिल्ली विश्वविद्यालय से सम्बद्ध ज़ाकिर हुसैन कॉलेज में स्थायी रूप से साहित्य के प्राध्यापक बने। अपने प्रवास के दिनों में उन्होंने रूसी का विस्तृत अध्ययन किया और बाद में लगभग दो दर्जन रूसी पुस्तकों का अनुवाद किया। संपादक के तौर पर भी इन्होंने कई बेहतरीन कार्य किये। इसके साथ ही प्रगतिशील लेखक संघ तथा अफ्रो-एशियाई लेखक संघ से कई सालों तक जुड़े रहे। अपने जीवन काल में कई महत्त्वपूर्ण कृतियों का सृजन किया जिनमें भाग्यरेखा, पहला पाठ, भटकती राख, पटरियाँ, वांगचू, शोभायात्रा, निशाचर, पाली, डायन (कहानी संग्रह), झरोखे, कड़ियाँ, तमस, बसंती, मय्यादास की माड़ी, कुंतो, नीलू नीलिमा नीलोफर (उपन्यास), माधवी, हानूश, कबिरा खड़ा बाज़ार में, मुआवज़े (नाटक); गुलेल का खेल (बालोपयोगी कहानियाँ) आदि मुख्य हैं। सृजनात्मक लेखन के लिये इन्हें तमस पर साहित्य अकादमी पुरस्कार, हिंदी अकादमी दिल्ली का शलाका सम्मान आदि प्राप्त हुए। 11 जुलाई सन 2003 को इनका स्वर्गवास हो गया।

वैसे तो हिंदी साहित्य जगत में दैदीप्यमान नक्षत्र के रूप में चर्चित साहित्यकार भीष्म साहनी किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। जीवन के विरोध को समय के प्रतिरोध से जोड़ने का कार्य हिंदी साहित्य जगत में अगर किसी ने किया, तो निश्चित रूप से वह भीष्म साहनी जी ही थे। कर्मठता, निरंतरता, व्यवहारिकता और सटीक सापेक्षता इनके लेखन में हमें दिखाई देती है, साथ ही इनके साहित्य लेखन में आमजन के हाशिये का स्वर गुंजायमान है। भीष्म साहनी जी लेखन के माध्यम से लोगों की पीड़ाओं को अपने में समेट लेते थे और उसे काग़ज़ के पन्नों पर अंकित करते थे। ताकि मानव की जो विकासवादी भविष्यगत संभावनाएँ हैं वह सत्य के निकट आ सकें और दमघोंटू जैसी ज़िन्दगी को जीने वाला आम नागरिक अपने हक़, अधिकार तथा शोषण के ख़िलाफ़ आवाज़ उठा सके। उनके लेखन में प्रतिकार नहीं बल्कि मानवतावाद का स्वीकार निहित है। भीष्म साहनी जी कहानी "कुछ और साल" में पात्र शिवशंकर के माध्यम से लिखते हैं कि - "मैं तुमसे कहूँ, मधुसूदन, इन्सान की उम्र बहुत छोटी है। ज्ञान का भण्डार कभी चुकता नहीं, पर आदमी ख़त्म हो जाता है। जब तक किसी विषय की जानकारी हासिल नहीं हो पाती कि मौत दरवाजा खटखटाने लगती है।"1

भीष्म साहनी जी बड़े मँझे हुए कलाकार थे। वह जीवन के उतार-चढ़ाव को भलीभाँति समझते थे। व्यक्ति की संवेदना और उसके सामाजिक सरोकार की पूरी अहमियत उन्हें मालूम थी। एक माँ का मोल और उसके ख़त्म होते वजूद तथा हाशिये पर जा चुकी ख़ुशियों की परख को वह समझते थे। कहानी "चीफ की दावत" में इसका बड़ा मार्मिक वर्णन उन्होंने किया है। एक माँ के दुःख, दर्द को बयां करते हुए लिखते हैं कि - "जब मेहमान बैठ गए और माँ पर से सबकी आँखे हट गईं, तो माँ धीरे से कुर्सी पर से उठीं, और सबसे नजरें बचाती हुई अपनी कोठरी में चली गईं। मगर कोठरी में बैठने की देर थी कि आँखों से छल-छल आँसू बहने लगे। वह दुपट्टे से बार-बार उन्हें पोंछतीं, पर वह बार-बार उमड़ आते, जैसे वर्षों का बाँध तोड़कर उमड़ आए हों। माँ ने बहुतेरा दिल को समझाया, हाथ जोड़े, भगवान का नाम लिया, बेटे के चिरायु होने की प्रार्थना की, बार-बार आँखें बन्द कीं, मगर आँसू बरसात के पानी की तरह जैसे थमने में ही न आते थे।"2

जीवन में प्रेम का महत्त्व सर्वोपरि माना गया है। और माना भी क्यों न जाए, यह प्रेम ही तो है जो सम्पूर्ण विश्व को आज भी एक सूत्र में बाँधे हुए है। प्रेम जीवन का वह अनमोल तोहफ़ा है, जिसको मिल जाये वह मालामाल, जिसे न मिले वो कंगाल। सात्विक प्रेम से ही रिश्तों की बुनियाद टिकी हुई होती है। और इसी के माध्यम से मानव को नई चिंतन दृष्टि प्राप्त होती है। प्रेम के बिना मानव अकेलापन महसूस करने लगता है। एक तरह से वह शून्य हो जाता है। भीष्म साहनी जी कहानी "अकाल मृत्यु" में प्रेम की महत्ता का वर्णन करते हुए धनराज के माध्यम से अनुराधा के प्रति कहलवाते हैं कि - "अनुराधा, जब से तुम गई हो, मैं शून्य में जी रहा हूँ। मैं कभी उन लोगों की ओर तक नहीं गया। तुम नहीं जानतीं मैं कितना अकेला हो गया था।"3

भीष्म साहनी द्वारा लिखित हानूश नाटक एक घड़ी बनाने वाले कारीगर के जीवन का जीवंत दस्तावेज़ है। इच्छा, अपूर्ण सुख, आकांक्षाओं की हत्या तथा सच्ची लगननिष्ठा का बयां-ए-हक़ीक़त है। हानूश नाटक में मानवीय स्थिति एवं परिस्थितियों को समकालिक सन्दर्भों में व्यक्त करने का प्रयास किया गया है। नाटक हानूश कटघरे में खड़े व्यक्ति की अस्मिता का चित्रांकन है। हानूश कहता है कि - "मैं भी कितना पागल हूँ! अपनी हैसियत को न आज तक समझा, न पहचाना। ऐमिल, तुम ठीक कहते थे कि बादशाह सलामत ने तुम्हें अन्धा बनाया है, पर इससे एक दिन तुम्हारी आँखे खुल जाएँगी। तुम्हें स्याह और सफ़ेद की पहचान आ जाएगी। (रुक जाता है फिर धीमी आवाज़ में) चलिए साहिब, मैं आपके साथ चलूँगा। मैं आपके पीछे-पीछे, एक वफ़ादार कुत्ते की तरह, आपके क़दमों में लोटता हुआ चलूँगा।...........क्योंकि मैंने एक दिन घड़ी बनाई थी।"4

भीष्म साहनी जी एक कथाकार के साथ बेहद संजीदाशील नाटककार भी थे। उन्होंने मानव जीवन की तमाम कठिनाइयों को अपने नाटकों में जगह दी। इसके साथ ही जीवन से संघर्ष करते हुए व्यक्ति को कैसे आगे बढ़ते रहना चाहिए, इसका भी ज्ञान दिया। उनके सम्पूर्ण नाटक समय, समाज और समाजवाद पर आधारित हैं। उन्होंने समय के साथ समझौता किया और समाज को जाँचा-परखा और फिर समाजवाद में बढ़ रही समस्याओं के समाधान की खोज की। अपनी लेखनी के माध्यम से भीष्म जी ने समाज में पनप रही कुविसंगतियों पर करारा प्रहार किया है और साथ ही नारी शक्ति को पुनर्जीवित भी किया। उसके हौसले को कभी टूटने नहीं दिया। ऐसा कार्य अपने समय में भीष्म साहनी जैसे विरले लेखक ही किया करते थे। भीष्म जी नाटक "आवाजें" में एक स्त्री को कठिन परिस्थितियों में संघर्ष करते हुए दिखाया है। नाटक में स्त्री के बारे में एनाउन्सर कहता है कि - "घर क्या है, एक कमरा है, पीछे छोटा-सा बाथरूम। कुछ बरस पहले उसका पति किसी औरत के साथ भाग गया था और धर्म बदलकर उसके साथ शादी भी कर ली थी। और यह अपने दो बच्चों को छाती से लगाए, जैसे-तैसे अपनी गुज़र कर रही है। नीलम की नौकरी है तो घर में चूल्हा जल रहा है। पर इसकी सास इसके पीछे पड़ी है कि नीलम घर से निकल जाए, घर खाली करे।"5

भीष्म साहनी जी ने एक नीलू नीलिमा नीलोफर नाम से उपन्यास लिखा था। यह उपन्यास नारी जीवन की त्रासदी को बख़ूबी उजागर करता है। इसमें एक स्त्री के बिखर जाने की कहानी दर्ज है। प्रेम, मोहब्बत, चाहत, रस्मों-रिवाज, समाज की मर्यादा आदि को सँभालने में ही ताउम्र एक स्त्री के जीवन को तबाह होते हुए दिखाया गया है। उसे न तो समाज समझ पाता है और न ही उसका पति। नीलू नीलिमा नीलोफर उपन्यास में नीलिमा पति सुबोध के प्रति कहती है कि - "अब सुबोध मेरे साथ चिपटेगा, आज शनिवार है। मेरा अंग-अंग टटोलेगा, मसलेगा, और नीलिमा की आँखों के सामने फिर से वह फड़फड़ाता चूजा आ गया, जिसके पंखों के नीचे कसाई की उँगलियाँ उसका अंग-अंग टटोलती रही थी। फिर जिस भाँति उस कसाई ने चूजे के पंखों को, जो उसके नंगे-बूचे शरीर को ढंके हुए थे, एक-एक करके नोच डाला था, वैसे ही यह आदमी मेरे शरीर को ढकने वाले वस्त्रों को नोचने लगेगा, और मेरे नंगे-बूचे शरीर पर वैसे ही आँखे गाड़ेगा जैसे कसाई चूजे के नंगे-बूचे शरीर पर गाड़े था, जो तब परलोक सिधार चुका था।"6

इस प्रकार हम देखते हैं कि मूर्धन्य साहित्यकार भीष्म साहनी जी के साहित्य में वैचारिक चिंतन का प्रभाव अधिक है। एक तरह से यह कहा जा सकता है कि उनका समस्त साहित्य जीवन की उपादेयता का अतुल भण्डार है। देश, समाज, व्यक्ति, संस्कृति आदि सभी को बेहतर ढंग से, परिमार्जित रूप में पाठकों के सामने प्रस्तुत करने का सफल प्रयास है।

सन्दर्भ सूची:

1. भीष्म साहनी - प्रतिनिधि कहानियाँ (कहानी - कुछ और साल), राजकमल प्रकाशन प्रा. लि., नई दिल्ली, तीसरी आवृत्ति - 2012, पृष्ठ - 53
2. भीष्म साहनी - पहला पाठ (कहानी संग्रह), कहानी - चीफ की दावत, राजकमल प्रकाशन प्रा. लि., नई दिल्ली, संस्करण - 2000, पृष्ठ - 14-15
3. भीष्म साहनी - पहला पाठ (कहानी संग्रह), कहानी - अकाल मृत्यु, राजकमल प्रकाशन प्रा. लि., नई दिल्ली, संस्करण - 2000, पृष्ठ - 87
4. भीष्म साहनी - हानूश (नाटक), राजकमल प्रकाशन प्रा. लि., नई दिल्ली, पाँचवा संस्करण - 2010, पृष्ठ - 125
5. भीष्म साहनी - सम्पूर्ण नाटक भाग - 2 नाटक - आवाजें, राजकमल प्रकाशन प्रा. लि., नई दिल्ली, पहला संस्करण - 2011, पृष्ठ - 167
6. भीष्म साहनी - नीलू नीलिमा नीलोफर (उपन्यास), राजकमल प्रकाशन प्रा. लि., नई दिल्ली, आवृत्ति - 2010, पृष्ठ - 176

रवि कुमार गोंड़
शोधार्थी हिंदी विभाग
केन्द्रीय विश्वविद्यालय हिमाचल प्रदेश
टेम्प्रोरी अकादमिक ब्लॉक शाहपुर छतरी हि.प्र.
176206
मोबाइल- 07807111737
Email- ravigoan86@gmail.com


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