| अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली |
![]() |
मुख्य पृष्ठ |
| 01.20.2008 |
|
तिनकों में आग लगाकर हाथ तापने वालों |
|
तिनकों में आग लगाकर हाथ तापने वालों
ढूँढ़ो सूखी लकड़ियाँ, रातें और सर्द होंगी सुअर औ भेड़ों से सीखो इंसानियत की बातें आपस में लिपटकर सोने से रातें हमदर्द होंगी इस वक़्त को आना है हर साल ज़िन्दगी में कुछ सोचो अभी ही वर्ना हर साँसें बर्फ होंगी इस मौसम भी आयेंगे लिहाफ बाँटने वाले हाथों पर कंबल होंगे, आँखें ख़ुदगर्ज होंगी चंदा को मिले आग ये माँगो उस ख़ुदा से या गिरा दो वे घर, जिनकी दीवारें बेदर्द होंगी |
| अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें
|