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07.06.2008
 

मतलब की नाव
रवि कवि


जीवन के इस दौर में
सब पर आपाधापी छाई है
दौड़ लगी है बेसुध - अंतहीन
इच्छाओं की भरी पिटारी है
न चिंता है देश समाज जनहित की
बस अपनी ही सुध में पलते हैं
हमदर्द, हमराह, हम ख़याल
अब अकेले पड़े है तन्हाई में
लूट संस्कृति का चलन जोरों पर है
मर्यादा की खाल पल पल नुच रही हैं
निज स्वार्थ निज लाभ
बस इतना ही आँखों में समाता है
सुविधाओं का अम्बार लगाना
हर कोई चाहता हैं
दिल में भी नहीं
घर में भी नहीं
ख्यालों में भी नहीं
अब किसी के लिए
किसी के पास जगह नहीं
मतलब की नाव पर
हर कोई सवार हो रखा है
और मतलब पूरा होते ही
कौन हैं आप? किसे याद रहता है
बड़ी विचित्र हवा चल रही है
अब इस अंधी दुनिया में
हाय पैसा ! बस पैसा !
की चल रही महामारी हैं
रिश्तों की अब किसे जरुरत
न ही दोस्त चाहिए अब
ख़ुद का सुख ही
सर्वस्व है अब
इतने में सिमट रही अब
दुनिया सारी हैं
शान्ति समर्पण और तपस्या
सब मौन पड़े है
झूठ और हिंसा
इस युग के नए नारे है
ईश्वर को भी चन्दा देकर खरीदने का
ढोंग हो रहा है हर ओर
मीनार ऊँची करने में बस लगा हुआ है
आज के युग का हर प्राणी
धरम सत्य और अहिंसा
सब बेमानी है इस दौर में
जीवन तो कठिन नहीं रहा पर
मोक्ष ज़रूर नामुमकिन कर रहे है
सब पिस रहे है मोह की चक्की में
और मस्त जीने की अदा
क्या खूब कर रहे है
असली नकली का भेद खत्म कर
सब एक राह चल पड़े है ! !
च्न्य है आज की मानव संस्कृति
और उसमें बसने वाले लोग
क्या कहे अब हम इनको
जो भूलाये ही रखना चाहते है
ख़ुद के इंसान होने का सत्य.........!


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