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ISSN 2292-9754

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09.02.2014


हमारा ज़माना

वर्तमान हो या अतीत हम बहुधा जो बात अपने समकालीन या अपने बुजुर्गों से सुनते हैं वो है 'हमारे ज़माने में ऐसा था' या हमारे समय में ऐसा नहीं होता था। उनके पास असंख्य अनुभव होते हैं। अपने अनुभवों को बताते हुए जो गाहे-बगाहे उनकी आँखों में नमी या कभी-कभी आँखों में ख़ुशी की चमक भी ले आती है।

ये विषय कुछ भी हो सकते हैं। मसलन हमारे समय का संगीत, कभी फ़िल्मी संगीत, पुराने संगीतकारों पुराने समय के संगीत के सार्थक शब्दों का वर्णन करते-करते उनके चेहरे पर आई ख़ुशी या कभी कभी उत्तेजना को बख़ूबी महसूस किया जा सकता है।

फिर हमारे समय में महंगाई इतनी न थी न ही इतनी मिलावट खोरी यह सब कहते-कहते उनकी आवाज़ की लाचारी को भी सुना जा सकता है। 'क्या हो गया है ज़माने को' कहने वाले असंख्य लोग मिल जाएँगे जो आप को यह बताने को तत्पर होंगे कि उनके समय में इतनी असंस्कृत युवा पीढ़ी नहीं थी। अवज्ञा की शिकार ये युवा पीढ़ी उनकी आँखों की किरकिरी बनी हुई है।

मुझे आश्चर्य होता है ऐसे लोगों पर और कभी-कभी क्षोभ भी। ऐसा प्रतीत होता है कि उनहोंने "घड़ी की सुई" को हमारे समय पर ठहरा दिया है। निराशा के अंधकार से घिरे ऐसे असंख्य लोगों के लिए मानो समय की गति रुक गई सी प्रतीत होती है।

मुझे ऐसे लोगों से एक ही प्रश्न पूछने का मन होता है कि क्या जो समय चल रहा है वो उनका नहीं है?? क्या उनको इस चल रहे समय में कुछ भी ऐसा सकारात्मक नहीं दिखता जो उनके चेहरे पर मुस्कराहट और गर्व का कारण बन सके??

अन्तरिक्ष युग में प्रवेश कर चुका हमारा समय संगीत से लेकर शिक्षा के स्तर पर किये जा रहे नित नए प्रयोग, ये नए अविष्कार लड़कियों का स्वतंत्रता के साथ आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ना युवा वर्ग का इतना अधिक आत्मविश्वास से ओत-प्रोत होना क्यों हम को प्रसन्नता से नहीं भर सकता?

समय गतिमान है और जिस प्रकार अच्छाई हर युग में मौजूद है इसी प्रकार बुराइयाँ हर युग हर काल में होती ही हैं।

अपराध हर युग में था बुराई हर काल में थी जिस प्रकार अच्छाई उस समय भी थी और इस समय भी है। आवश्यकता है अच्छे को अपनाकर, बुराई को त्यागने की।

आज भी संगीत के मंच पर छोटे बच्चों, युवा वर्ग को पुराने फ़िल्मी गीत गाते हुए और उनकी ताल पर झूमते हुए दर्शकगण को देखा जा सकता है। जो उनके समय के अलावा इस समय के भी होते हैं।

आज भी माँ-बाप और रिश्ते-नातों की परवाह करते लोगों की अच्छी खासी संख्या को देखा जा सकता है।

ये कम गर्व की बात नहीं है कि जिन हाथों में कभी कलम व पोस्टकार्ड था वही हाथ अब लैपटॉप पर फुर्ती के साथ उँगलियाँ दौड़ा रहे हैं।

वो ये बात कभी नहीं कहते कि हमारे समय में भावनाएँ अधिक अच्छे ढंग से व्यक्त होती थीं। ऐसे व्यक्ति समय का विभाजन हमारे और तुम्हारे के बीच नहीं करते उनहोंने उस समय को भी जिया है और चूंकि आज के समय को भी वो अपना समय ही मानते हैं। क्योंकि उन्हें समय का आनंद लेना व समय से तारतम्य बैठाना आता है।

बेहतर है हम अपने नकारात्मक विचारों से उबरते हुए, समय के आगे कोई लकीर न खींचते हुए हर काल के सकारात्मक पहलू को अपनाते हुए और नकारात्मक को नकारते हुए निरंतर ख़ुशी और समर्द्धि की राह पर आगे बढ़ते रहें।


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