अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
07.01.2014


अव्यक्त शांति

व्याकुल मन की वेदना व्यथा लेकर कुछ शांति पाने की आस में, कुछ हल्के होने के प्रयास में स्वतः ही कदम मंदिर की ओर खिंच चले। रिक्शेवाले से पूछा, "मंदिर का क्या लोगे?"

"बाबू जी 40 रुपया लगेगा।" "

दिमाग ख़राब है? चार कदम पर मंदिर इतना पैसा?"

"चढ़ाई है बाबूजी।"

15 मिनिट बहस के उपरान्त 30 रुपये में उसे तय करके मैं गंतव्य की ओर बढ़ चला। रिक्शेवाले का कथन सही था चढ़ाई पर, उतर कर सप्रयास रिक्शा खींच कर उसने पुनः पैडल मारना शुरू किया। बीच-बीच में अपने गमछे से मुँह पोंछता हुआ वो रिक्शेवाला पता नहीं क्यों अब मेरा ध्यान आकृष्ट कर रहा था। श्रम के आधिक्य के कारण उसकी पीठ व वस्त्र पसीने से तर-ब-तर हो रहे थे। अनायास मैंने उससे पूछा, "दिन भर में कितना कमा लेते हो?"

"100 से 150 के बीच," हाँफते स्वर में उत्तर आया। मैं मन ही मन गुणा कर के देख रहा था उसकी महीने की आय 3000-4000 से अधिक न थी।

"घर में कौन कौन है?"

"माँ बाप चार बच्चे और घरवाली," उत्तर आया।

यानी आठ आदमियों का परिवार, मैं पुनः सोच में पड़ गया।

मंदिर आने पर मैंने उससे कहा, कि अगर कोई सवारी न मिले तो रुके रहना लौटना भी है। ऐसी हिदायत देता हुआ मैं मंदिर की सीढ़ियाँ चढ़ कर ऊपर पहुँचा। आरती चल रही थी और घंटियों का स्वर वातावरण में गूँज रहा था। श्रद्धालु गण हाथ जोड़ कर भक्ति भाव से खड़े थे। मैंने भी हाथ जोड़ व आँखें बंद करके चित्त को एकाग्र करने का प्रयास किया। आश्चर्य! मेरी आँखों के आगे ईश्वर की मूर्ति के बजाय वो चेहरे से, गंदे से अंगोछे से स्वेद कण पोंछता हुआ रिक्शेवाला नाच रहा था। मन की व्याकुलता शांत होने के बजाय और बढ़ गई थी। थके कदमों से नीचे उतरा तो रिक्शेवाला वहीं था। अपने गंतव्य तक पहुँचते-पहुँचते मैं शायद किसी निर्णय पर भी पहुँच चुका था। उसके हाथ पर सौ का नोट रखते हुए मैं उसके दो बच्चों के स्कूल में एडमिशन और उनकी पढ़ाई पर होने वाला व्यय के भार वहन करने की सूचना उसे दे रहा था। मैं उसके लिए इससे अधिक तो नहीं कर सकता था पर आभार व्यक्त करती उसकी छलछलाती आँखें मेरे हृदय में मंदिर की घंटियों से अधिक झंकार पैदा कर रहीं थी और मैं एक अव्यक्त शांति महसूस करते हुए अपने को भारहीन पा रहा था।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें