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ISSN 2292-9754

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02.17.2017


पारिश्रमिक

उर्दू के दिवगंत शायर लुधियानवी फ़िल्मी दुनिया के जाने-माने गीतकार थे। फ़िल्म जगत में प्रवेश से पूर्व उनका कार्य स्थल लाहौर था। वहाँ के साहित्यिक क्षेत्र के उनकी बड़ी ख्याति थी, परन्तु आर्थिक रूप से उनकी स्थिति कभी अच्छी नहीं रही। भारत विभाजन से पूर्व साहिर लुधियाना लाहौर से एक उर्दू मासिक ’साक़ी’ प्रकाशित करते थे। यद्यपि उनके साधन सीमित थे और पत्रिका भी घाटे में चल रही थी, परन्तु वे लेखकों को उनकी मजदूरी अवश्य देते थे, चाहे वह कम ही क्यों न हो।

एक बार वे लेखकों को समय पर पैसे न भेज सके। ग़ज़लगो शमा ’लाहौरी’ को पैसे सख़्त ज़रूरत थी। वे भयंकर सर्दी में काँपते हुए हुए साहिर के घर पहुँचे और अपनी प्रकाशित ग़ज़लों के पैसे माँगे। साहिर उन्हें अन्दर ले गए। उन्हें बैठाया और गर्मा-गर्म चाय पिलाई। जब शमा लाहौरी की कंप-कंपी बंद हो गई तो सहिर शांत भाव से उठे। उन्होंने खूँटी पर टँगा हुआ नया कोट उतार कर "शमा" को सौंप दिया और कहा इस बार नकद की बजाय इस में पारिश्रमिक दिया जा रहा है। शायर की आँखें सजल हो गईं, वह कुछ भी बोल न सके।


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