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06.17.2007
 
तेरे प्यार को तब मैं सच मानूँ
रंजना भाटिया

हर पल मुझको तुम दिल से पुकारो
मेरी यादों के गहनॊं से ख़ुद को सँवारो
साथ हर सुख-दुख में तेरा हो तो जानूँ....
तेरे प्यार को तब मैं सच मानूँ

ग़म के अंधेरों का पहरा है मुझ पर
तन्हाईयों का असर गहरा है मुझ पर
मेरे साथ तुम ख़ुद को बहा लो तो जानूँ
तन्हाइयों के लम्हों को चुरा लो तो जानूँ

तेरे प्यार को तब मैं सच मानूँ .......

अपनी वीरान रातों में क़रीब पाते हो मुझको
महफ़िल में तुम अपनी हबीब बनाते हो मुझको
मेरे जश्न-ए-बर्बादी में याद करो तो मानूँ
तेरी दिल की बात को तब जा कर में पहचानू

तेरे प्यार को तब मैं सच मानूँ .......

सोचना तुम्हारा गुलाब सा मुझको,
मेरी ख़ूबसूरती का जवाब था मुझको
पर काँटो की चुभन है जुदाई तुम्हारी
अब मुझको गले लगा लो तो जानूँ

तेरे प्यार को तब मैं सच मानूँ......

दूर रह कर भी तेरे पास रहने का अहसास रहे
मेरा ज़िक्र तेरे ज़हन में, जिगर में ख़ास रहे
मेरे वजूद को इस कदर ख़ुद में समा लो तो जानूँ
मेरे जज़्बों को,ग़ज़लों के अल्फ़ाज़ों में सजा लो तो जानूँ

तेरे प्यार को तब मैं सच मानूँ .....


ना हो कोई भी मेरे सिवा प्यारा ज़िंदगी में तेरी
बस मेरी आरज़ू, मेरी मोहब्बत हो तिश्नगी में तेरी
इन उम्मीदों को मेरी तुम अपनी वफ़ा दो तो जानूँ
कुछ वादे मोहब्बत के हँस के निभा लो तो जानूँ
तब तेरे प्यार को मैं सच मानूँ..............................



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