अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली मुख्य पृष्ठ
06.17.2007
 
सोच
रंजना भाटिया

कभी-कभी मैं सोचती हूँ कि,
मैं जो कविता लिखती हूँ,
क्या तुम इसे पढ़ते भी होगे,
जितना याद मैं तुम्हें करती हूँ,
क्या उतना याद तुम भी मुझे करते होगे,
इनमें छिपे मेरे भावों को,
तुम भी समझते होगे,
क्या इन्हें पढ़ कर कोई भाव तुम्हारे दिल में भी आता होगा,
क्या उस समय तुम्हारा दिल मुझे अपनी बाहों में,
लेने को मचल जाता होगा....
मैं अक्सर अपनी कल्पना में,
तुझको इन्हें पढ़ता पाती हूँ,
कभी मुस्कुराहट, कभी प्यार, कभी सोच के भाव
तेरे चेहरे पर पाती हूँ,
और तुम्हारे यही भाव जैसे मेरे दिल को पुलकित कर जाते हैं,
मेरे अन्दर छिपे भावों को, प्यार को एक नई,
कविता का रूप दे जाते हैं।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें