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06.17.2007
 
रेत महल
रंजना भाटिया


दूर तक फैला यह रेगिस्तान सा जीवन
और सामने केवल विराने से साये फैले हैं

ख़ुशी, प्यार और अपनी अनकही बातों के निशान
सूखी रेत पर कदमों के निशान की तरह मिट जाते हैं

दे जाते हैं कुछ लोग अपनी यादें ऐसे
सिर्फ़ एक मृग तृष्णा सी झलक दे जाते हैं

मेरे सपने क्यूँ ज़िन्दगी की हक़ीक़त में
बस रेत महल बन कर ढह जाते हैं

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