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01.20.2008
 
जय श्रीकृष्ण, ॐ नमो शिवाये. .....यूँ किया हमने नए साल का स्वागत
रंजना भाटिया

गुजरात जब मैं आज से लगभग २० साल पहले गई थी तो उस वक्त सोचा भी नहीं था की दुबारा फिर यहाँ आना होगा.. पर जो बाँके बिहारी की इच्छा। इस बार का घूमना तो एक यादगार पल बन गया सब बहनें और उनके बच्चे अपने बच्चे, और एक नया जोश विश्वास; सब कुछ अदभुत था।

हमारा सफ़र शुरू हुआ २६ दिसम्बर से रात को ८ बजे राजधानी से चले और सुबह ठीक १० बजे अहमदाबाद। रास्ते में की खूब मस्ती आगे घूमने का जोश बड़े से ले कर छोटे सब में था। अहमदाबाद में गेस्ट हॉउस बुक था। सब जा के पहले फ्रेश हुए ..और बढ़िया सी चाय पी कर चल पड़े। सबसे पहले अपने मनपसंद जगह शापिंग। यह जगह लाल दरवाज़ा नाम से मशहूर है। जम के शापिंग की हम सबने और फिर परेशान हो गए कि अब आगे तो इतनी यात्रा करनी है जो खरीदा है उस समान का क्या करें। बहुत मुश्किल से बेटी जहाँ रहती है पी जी के रूप में उसके कमरे में वह सब समान रखा। समय भी कम था और आगे जाना था तो शापिंग को दी यही मन मार के लगाम.. और इस के बाद चला हमारा कारवां यू एस पिज्जा की तरफ़। यह भी एक मजेदार जगह है - अहमदाबाद की। १५५ रुपये में जितना मर्जी आए सलाद खाओ, पिज्जा खाओ सूप पीयो... गार्लिक ब्रेड खाओ। सच में हर बार कुछ नया सलाद और दिल भर के खाने की छूट, पर बेचारा पेट भी क्या करे। इन सबको खाने के बाद देते हैं आइस क्रीम ..वह एक ही देते हैं। दिल किया सुझाव दूँ भाई यह भी अनलिमिटेड कर दो। उनसे पूछा की इतनी बेहतरीन है आपकी यह सर्विस आप दिल्ली या एन सी आर में इस को क्यों नहीं खोलते? जवाब दिया धीरे से मेरी छोटी बहन ने की शायद यह जानते हैं की वहाँ के लोग बिंदास है और खूब खाते हैं। खैर द्वारका जाने का समय "टावेरा" से रात को १२ बजे तय हुआ था अभी जाने में समय था क्या करें । बच्चों ने शोर मचाया की चलो यहाँ एक मूवी देखेते हैं। टिकेट लिए और देखी वेलकम! बस मूवी खत्म होते ही जाने का समय भी हो गया। सबने अपने समान को पैक करके आगे की यात्रा शुरू की।

एक बात माननी पड़ेगी की गुजरात की हाई वे रोड्स और रोशनी सड़कों पर खूब है, पूरा रास्ता साफ सुथरा कहीं से एक बार नहीं लगा की हम इतनी रात को सफ़र कर रहे हैं। दिन में गरम रहने वाला गुजरात रात को काफ़ी ठंडा था। कहीं कहीं कोहरा भी घना सा आया पर सुबह ५ बजे हम द्वारका में थे। यहाँ हमारी कोई बुकिंग नहीं थी; और जिस धर्मशाला रेस्ट हॉउस या होटल में पता किया वही फुल! सुबह होने में अभी देर थी, हलका सा अँधेरा था अभी माहोल में और कुछ ठंडक भी। एक ऑटो वाले ने कहा की वह हमारे साथ चल कर बता सकता है कि कोई होटल या कुछ देर रहने को जगह मिल जाए। बहुत तलाश करने के बाद एक कमरा मिला ५०० रुपये में। हमने कुछ देर ही रुकना था फिर आगे निकालना था बेट द्वारका और आगे पोरबंदर के लिए।

श्री द्वारका नाथ जी का मन्दिर पश्चिम समुन्दर के किनारे है यह हिंदू धरम के चार धामों में से एक माना जाता है। यहाँ पर कृष्ण जी की प्रतिमा बहुत ही प्रभावशाली है। द्वारकानाथ जी के वस्त्र समय अनुसार बदले जाते हैं, होली, दिवाली, जन्माष्टमी के मौके पर इनका शिंगार देखने वाला होता है। यहीं पर पास ही संगम स्थान भी है गोमती नदी के दर्शन भी यहीं होते हैं सब बहुत ही पावन है। पर वही बात की पण्डे आपको बहुत परेशान करेंगे और गोमती नदी के दर्शन हेतु जायेंगे तो वहाँ इतनी काई है की पैर फिसलने का डर होता है। और उस पर पंडो का इजहार की यहाँ पर आचमन करो। खैर हम सबने तो श्रद्धा पूर्वक बस हाथ जोड़े और प्रसाद अपनी श्रद्धा से वहाँ अर्पण किया। अब पेट पूजा की बारी थी सुबह से सबको हिदायत दे दी थी कि पहले दर्शन होंगे फिर खाने पीने की बात कोई करेगा। खाने की लिए जब जगह देखी तो सब तरफ़ ढोकला, दाल वडा, और कुछ नमकीन दिखी। बताया गया की यहाँ के लोग यही नाश्ता करते हैं। अब बच्चे यह सब खाने की तेयार नहीं थे, बहुत मुश्किल से कुछ दूर जाने पर एक पंजाबी होटल मिला। पर वहाँ का सर्विस करने वाला बन्दा शायद हमसे भी ज्यादा थका था। इतनी देर में पूरी आलू लाया कि हम सब कि भूख भी बाय बाय बोल गई!

आगे चले बेट द्वारका की तरफ़। यह समुन्दर के बीच में बना द्वारका नाथ जी का मन्दिर है, इस पर जाने के लिए मोटर बोट करनी पड़ती है। अब तक १२ बज चुके थे और गरमी पूरी तरह से हावी थी। एक तो धूप तेज सामने सारा समुन्दर जिसका पानी बहुत ही साफ था और उस पर मोटर बोट वाले टैब तक नहीं चलते जब तक सवारी पूरी से भी ज़्यादा न हो जाए। कृष्ण कृष्ण करके मोटर बोट चली। वहाँ पहुँचे तो पता चला की मन्दिर के द्वार अभी ४ बजे से पहले नहीं खुलेंगे, बाहर से माथा टेका। फिर वही की मोटर बोट तभी चलेगी जब तक यह पूरी तरह से भर नहीं जाती है। उस दिन जो धूप में हम सब तपे, भूल नहीं सकते हम उस समय को। किनारे पहुँचते ही पीया खूब सारा पानी ठंडा तो जान में जान आई।

आगे बढ़ा हमारा कारवां इसके बाद पोरबंदर। यहाँ पर हमारी बुकिंग पहले से ही तोरण गेस्ट हॉउस में बिटिया ने करवा रखी थी। बहुत ही सुंदर जगह समुन्दर के किनारे। खुला सा गेस्ट हॉउस देख के ही आधी थकावट उतर गई। थोड़ा फ्रेश हुए। और सामने बीच पर जा के बहुत देर तक बैठे रहे। यहाँ के समुन्दर का पानी इतना खारा है कि किनारे पर बालू सख्त चट्टान सी हो चुकी है। ठंडी हवा में जितनी देर बैठ सकते थे बैठे फिर भूख लगने पर वहाँ के स्वागत होटल में गए। बहुत ही अच्छा खाना था वहाँ का अब सब बहुत थके हुए थे। पर कोई सोने के मूड में नहीं था।  सो कुछ देर बात गपशप की। कुछ देर हँसी मजाक के बाद सब कि आँखे बंद होने लगी। और जब सुबह उठे तो सब एक दम उगते सूरज से ताज़ा थे, सब फटाफट नहाए और हमारा शुरू हुआ सबका फोटोशेशन। सबने खूब फोटो लिए और चल पड़े फिर गाँधी जी के जन्म स्थान की और। बहुत ही सुंदर जगह। वहाँ पग पग पर गांधी जी के होने का एहसास था और दिल में था ख़ुद के भारतीय होने का गर्व। यहाँ कुछ देर रुकने के बाद चल पड़े हम सोमनाथ की तरफ़।

पोरबंदर से सोमनाथ का रास्ता बहुत ही सुंदर है। बहुत ही हरियाला सा। नारियल और केले के खेत मन मोह लेते हैं। इसी रास्ते में आया माधवपुर बीच बहुत ही सुंदर और साफ। कुछ देर रुक के हमने यहाँ खूब मस्ती की। फोटो और यहाँ पर खूब सारा नारियल पानी पीने के बाद। चल पड़े आगे।

सोमनाथ मन्दिर। [Photo]यहाँ पर बुकिंग नहीं थी और यही पर एक अनजान ऑटो वाले ने हमारी बहुत मदद की। बिना किसी स्वार्थ के उसने हमे उस अनजान जगह पर कई अच्छे होटल दिखाए। पर नए साल के स्वागत में वहाँ सब होटल भरे हुए थे। उस अनजान ऑटो वाले ने हमारी बहुत मदद की और आखिर हमें मिल ही गया एक गेस्ट हॉउस। समान रखा और सोमनाथ मदिर के दर्शन किए। बहुत ही सुंदर मन्दिर है यह समुन्दर के किनारे बना हुआ ख़ुद में कई इतिहास समेटे। पहले भी कई लूटा गया कई बार बना कई बार टूटा और अब भी शायद आतंकवाद के निशाने पर है, तभी बहुत ही ज्यादा सिक्यूरिटी थी। यहाँ हमें पता नहीं था पहले; सो ज्यादा फोटो नहीं ले पाये यहाँ के। रास्ते में विरावल भी देखा जहाँ कृष्ण जी को तीर लगा था और रात को देखा लाईट एंड साउंड शो जो सोमनाथ मन्दिर बनने और टूटने की पूरी कथा बताता है। अच्छा लगा इसको और अच्छा बनाया जा सकता है। पर जितना भी देखा बहुत पसंद आया। [Photo] समुन्दर की लहरों की आवाज़ उस पर शिव की आरती। सुंदर मन को मोह लेने वाली थी यह। कभी न भूलने वाला समां है यह। रात के दस बजने वाले थे हमने रात्रि दर्शन किए और खाना खा के सो गए। नहीं नहीं चुप चाप नहीं! कुछ देर आज के घूमने की बातें और कुछ गाने और शरारतें कर के। छोटी बेटी को थोड़ा सा बुखार आ गया था सो सबको कहा अब सो जाओ। ताकि कल दियू के निकला जा सके। जो वहाँ से सिर्फ़ ८० किलोमीटर की दूरी पर है।

 

रास्ता बहुत ही सुंदर वही नारियल और केले के पेड़। [Photo].और जब गेस्ट हॉउस पहुँचे तो बस वह देख के मज़ा आ गया यह जगह उन थी दियू से १० किलोमीटर दूर। दियू शहर बहुत ही सुंदर है। घर इतने सुंदर है की बस वही देखते रहने को दिल करता है। पर बीच उतना ही गंदे पानी का। शायद वहाँ होने वाली वाटर गेम्स और चलने वाली मोटर बोट ने पानी को साफ नहीं रहने दिया। खूब मौज की यहाँ खूब वाटर गेम्स पैरा सेलिंग की। पानी गन्दा था। पर हम कहाँ बाज आने वाले थे खूब पानी में खेले। और रात को दियू का नजारा लिया रात का। अगले दिन था इस साल का आखरी दिन। इस दिन वहाँ का प्रसिद्ध फोर्ट देखा चर्च देखा [Photo]और फिर की वाटर गेम्स। पर शाम होते ही यहाँ का माहौल अजब रंग से रँगने लगा। सब तरफ़ पियक्कड़ ही पियक्कड़ दिखने लगे। वहाँ से हम भागे क्रूज़ में जहाँ जम के डांस किया और नए साल का स्वागत। फिर वापस होटल में अपने। अगले दिन वापसी थी। कभी न भूलने वाली याद गार यात्रा थी यह। बहुत मदद की हमारी गाड़ी के ड्राइवर हितेश ने, और बच्चो के हँसते गाते जोश वाले माहोल ने। अब फिर से इंतज़ार है एक ऐसे ही और यादगार सफ़र का... !! 


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