अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली मुख्य पृष्ठ
06.17.2007
 
एक युग
रंजना भाटिया

मेरा दिल तेरे दिल की आवाज़ पहचानता है
तेरे दिल की तरह मेरा दिल भी हर पल
तेरा साथ चाहता है
समय के फैले हुए सायों से
गुज़र जाना चाहता है
फैली हुई तन्हा रातों के इन लम्बे
काले सायों में रंग भरना चाहता है,
हर रसम हर रिवाज़ को तोड़ कर
बाहर आना चाहता है,
यह ज़िन्दगी बहुत कम मालूम होती है उसको
तभी तो घंटों, दिनों, रातों का साथ नहीं,
वह पूरे एक युग साथ चाहता है.....


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें