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09.25.2007
 
भला सिपाहिया डोगरिया
रंजना भाटिया

 6 दिसम्बर की शाम रेडियो पर ख़बर सुनाई जा रही थी कि कट्टर पंथियों ने बाबरी मस्जिद तोड़ दी सारे देश में दंगा फैल गया है, हज़ारों लोग मारे गये हैं, राष्ट्रीय शोक की घोषणा कर दी गयी है। सब तरफ़ दुख ओर दर्द की लहर है, सारा माहौल सहमा हुआ सुनसान हो जाता है और एक चुप सी छा जाती है।

दूर बार्डर पर लड़ते सैनिकों के शिविर में जहाँ हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई सब कंधे से कंधा मिला कर देश की रक्षा के लिए मोर्चा संभाले खड़े हैं, कोई बाबरी, आयौध्या का झगड़ा नही सिर्फ़ अपने देश के लिए मर मिटने को तैयार हैं सब। बस.. इसी सोच में डूबे हैं वो सब भी की हम क्यूँ और किसके लिए लड़ रहे हैं? आख़िर यहाँ हमने अपनी जान को दाँव पर लगा रखी है और वहाँ हमारे परिवार वाले एक दूसरी लड़ाई लड़ रहे हैं। यहाँ सर्दी गर्मी, बरसात, धूप की परवाह किए बिना यह युद्ध तो सबको दिख रहा है.. पर देश के अंदर यह कौन सा अघोषित युद्ध लड़ा जा रहा है जिसका कोई नियम नही है।  

राजेश भी उन्हीं सिपाहियों में देश की रक्षा के लिए वहाँ बार्डर पर तैनात देश का सिपाही था। वो जिस बार्डर पर था वहाँ बर्फ़ और ठंड से साँस लेना तक मुश्किल था। उसने जब से यह बाबरी अयोध्या की खबर सुन थी उसका दिल काँप रहा था। उसका घर संसार भी उसी जगह था जहाँ से यह सब ख़बरे आ रही थीं। वो बहुत देर से अपनी पत्नी और बच्चे से बात करना चाहता था पर फोन लग नही रहा था और कई दिन से कोई ख़त भी नहीं आया था। दूर बर्फ़ीली पहाड़ी पर बनी यह पोस्ट बहुत सुनसान थी, सिर्फ़ कभी-कभी अचानक होने वाली गोलों की आवाज़ बता देती थी कि यहाँ भी कोई जीवन है, चाहे वो सिर्फ़ नाम का है। शुरू-शुरू में यहाँ की प्राकृतिक सुन्दरता दिल को लुभाती है पर फिर वो सुनसान जगह इंसान को पागल करने लगती है .. । राजेश अपने बेस कैंप के बाहर अपनी ड्यूटी पर था पर आज उसका ध्यान बार बार अपने घर की तरफ़ जा रहा था ...। कानों में डोगरी गाने के बोल गूँज रहे थे.... "भला सिपाहिया डोगरिया दुइ दिन छुट्टी आ जा की तेरे बिना बडा मंदा लगदा ...।" इसका अर्थ उस को उसकी पत्नी का संदेश देता लग रहा था कि दो दिन की छुट्टी ले कर मुझसे मिलने आ जाओ तुम बिन बहुत उदास सा लगता है सब। पर दिल में उसकी तस्वीर और कोई संदेश आने के इंतज़ार के सिवा वो कर भी क्या सकता था। भावी मिलन की आस लिए वो अपने परिचय पत्र के साथ रखी अपनी पत्नी, बच्चे की फोटो को देख लेता और सोच में डूब जाता।

तभी उसके साथी ने आ कर कहा की उसके लिए फोन है, लाइन बहुत जल्दी कट हो रही है, इसलिए जल्दी से आ के सुन ले। वो भागा उसका दिल किसी अनहोनी आशंका से डरा हुआ था और फोन पर जो उसने सुना वो उसके होश उड़ा देने के लिए काफी था। वो यहाँ देश की, अपनी मातृभूमि के लिए सब कुछ भुला के ड्यूटी कर रहा था और उधर देश के अंदर उसका सब कुछ एक जनून की भेंट चढ़ चुका था। उसकी बीबी की इज़्ज़त, जान और उसके बेटे की साँसे यह अंधे धर्म का जनून ले गया था..। आँखो में आँसू के साथ धुँधली होती बीबी की तस्वीर.. मन को मोहती बच्चे की मुस्कान और कानो में गूँजता गीत.. भला सिपाहिया डोगरीया दो दिन छुट्टी आ जा की तेरे बिना मंदा लगदा उसको जैसे दूर कही गहरी वादी से आता लग रहा था। दिल में एक सन्नाटा सा छा गया था.. गोलो की आती आवाज़ अभी भी यह बता रही थी की जीवन अभी है ओर यूँ ही चलता रहेगा.... ।



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