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08.06.2007
 
ज़िंदगी के रंग
रंजना भाटिया

देखती हूँ ज़िंदगी को मैं अक्सर
यूँ ही लम्बे सफ़ेद कैनवास पर
और फ़िर देखते ही देखते इन में
कई रंग से जैसे बिखर जाते हैं
तब हर गुजरता लम्हा बन जाता है
एक अनदेखी सी तस्वीर कोई
और उसमें कई रंग
यूँ ही कभी सँवरते
कभी धुँधले से चमक जाते हैं
प्रेम का रंग खिलता है जब गुलाबी हो कर
दर्द के घने अंधेरे छँट जाते हैं
ज्ञान का सफ़ेद सा उजाला खोल देता है
जब मन की खिड़कियाँ सारी
रूह के कोने कोने में
जैसे आशा के सैकड़ों दीप झिलमिलाते हैं
जीवन तो नाम है कभी धूप, कभी छाँव का
पीले पतझर से यह पल हर पल मुरझा के फिर हरे हो जाते हैं
उड़ने दो अपने दिल की हर धड़कन को नीले मुक्त गगन में
अनाहत संगीत के सुरों से सजे यह ज़िंदगी के रंग
कोरे कैनवास पर अपनी हर अदा से मुस्कराते हैं !!



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