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03.15.2008
 

विदा-वेला
प्रो. रामस्वरूप शर्मा


विजन पंथ में तुम मुझे भूल जाओ,
इसी से नई रागिनी छेड़ता हूँ।
प्रवासी तुम्हारी मिलन यामिनी के,
सुखद स्वप्न को मैं विवश मेटता हूँ।।

करोगे प्रतीक्षा कहो एक पल की,
अभी एक तरणी शिथिल हो रही है।
निखरती निराली विमल चाँदनी में,
गगन की व्यथित आँख भी रो रही है।।

लहर मारती है थपड़े तटों को,
तुम्हारा हृदय पर लहर ले रहा है।
यहाँ नाव मझधार में डूबती है,
हृदय में उसे कौन फिर खे रहा है।।

निकलती अभी एक झंकार ही थी,
हृदय-बीन को मैं तुम्हें भेंटता हूँ।
प्रवासी तुम्हारी मिलन यामिनी के,
सुखद स्वप्न को मैं विवश मेटता हूँ।।

तुम्हारे लिये शूल भी फूल होवें,
मुझे राग, अंगार होंगे भले ही।
अधर पै तुम्हारी उदासी न झाँके,
हृदय दग्ध मेरा विरह में घुले ही।।

मधुर राग होगा, नया साथ होगा,
नए आवरण में मुझे भूल जाना।
न संदेश दूँगा कि फिर याद आए,
विदा लो तुम्हें है अभी दूर जाना।।

रहो दूर , लेकिन सुखी, आस लेकर,
न निश्वास तुम से बिछुड़ फेंकता हूँ।
विजन पंथ में तुम मुझे भूल जाओ,
इसी से नई रागिनी छेड़ता हूँ।।


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