कब तक भागोगे
जीवन के महासमर से
सुनो युधिष्ठर !
तुमने थामी मूल्यों वाली जो समिधायें
झपट रही हैं उन पर षड़यंत्री मुद्रायें
सपने हैं, अपने हैं
लेकिन हृदय नहीं है
घिरे हुए हो तुम
रिश्तों के इस परिकर से
सुनो युधिष्ठर !
ये टूटी आस्थाओं वाले दरके दिन हैं
घायल कंधे, तन हैं कहीं, कहीं पर मन हैं
रणभेरी सुनकर भी
क्यों तुम निकल न पाये
गहरे
मोह- सिंधु वाले
इस अहम- भंवर से
सुनो युधिष्ठर !
तम के धनु की प्रत्यंचा पर तीखे सर हैं
और लक्ष्य पर तुम हो या तेरों के घर हैं
सहम - सहम कर भी
लड़ना पड़ता है सबको
कौन बचा है
आलोकित गीता के स्वर से
सुनो युधिष्ठर !
कब तक भागोगे
जीवन के महासमर से
सुनो युधिष्ठर !