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06.16.2007
 
 ग्रीष्म पर कुण्डलियाँ
डॉ. राम सनेही लाल शर्मा ‘यायावर’

(१)
राइफल लिये धूप की, फिरता ग्रीष्म निःशंक
धूप आर डी एक्स ले, फैलाता आतंक
फैलाता आतंक, काँपती है हरियाली
विस्फोटित हो रहा, बवण्डर बम विकराली
नदियाँ उथली हुई, कूप का सूख गया जल
फिरे नक्सली ग्रीष्म, धूप की लिये राइफल

(२)
धूल बबण्डर आँधियाँ, जलती लू की हौंस
सूरज देने लग गया, चक्रवात की धौंस
चक्रवात की धौंस, काँपते हैं वन उपवन
किलकारी सहमती, सहमते शिशु के चुम्बन
हाँफे धरती शिथिल, हाँफता है यह अम्बर
नाचे लू नर्तकी, नाचते धूल बबण्डर

(३)
महँगाई सी दोपहर, सदाचार सी प्रात
घोटालों से दिन हुए, नीति वाक्य सी रात
नीति वाक्य सी रात, भूमि सब लगती वंध्या
नेताओं के शिथिल, आचरण जैसी संध्या
नई बहू खा आम, ले रही है उबकाई
बढ़ी सास की खुशी, बढ़ रही ज्यों महँगाई

(४)
सूरज को रिश्वत खिला, फैला कुटिल कुतंत्र
ग्रीष्म माफिया रच रहा, अब भीषण षडयंत्र
अब भीषण षडयंत्र, समानांतर शासक है
शूटर हैं लू धूप, बवण्डर अनुशासक है
आँधी है प्रेयसी, सजाये मारक सज - धज
कौन मिलाये आँख, अशीषे जब खुद सूरज

(५)
सहमा सहमा कमलवन, सूखे सागर ताल
सूरज गुस्से में हुआ, जब अगिया बैताल
जब अगिया बैताल, काँपती भय से छाया
सूखी हरियाली के, तन की ममता- माया
अब दोपहरी शांत, मिट गयी गहमी गहमा
रोष देख सूरज का, वट दादा भी सहमा

०३ मई २००७


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