डा० रामसनेही लाल शर्मा यायावर


कविता


ग्रीष्म पर कुण्डलियाँ
तुड़वाकर लौटा हाथ पाँव 
वरदान मिले न मिले
सुनो युधिष्ठर
हर बार समय