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04.09.2008
 

शहर के बीचों-बीच
डॉ० रामनिवास ‘मानव’


क्या हो गया है इस शहर को !
हर दरवाजे और मुंडेर पर
उलटी लटकी हैं अबाबीलें
और घूम रहे हैं चमगादड़।
जो घना बाजार
कभी भीड़ से अंटा होता था
और जिसमें शोर-शराबा
चमक-दमक से सटा होता था,
अब वीरान है।
सड़कों पर घूमते हैं
आज भी कुछ धड़धड़ाते चेहरे,
जो आदमी-से दिखते तो हैं,
पर आदमी नहीं होते,
क्योंकि उन्हें देखकर
आँखें पथरा जाती हैं,
चेहरा ज़र्द हो जाता है
और शरीर में
कंफपी-सी छूटने लगती है।
आज शहर की सारी चिड़्याँ
जा छुपी हैं घोंसलों में।
उनका गाना, पंख फड़फड़ाना,
सब बन्द है।
जब भी निकलती है बाहर
कोई चिड़या घोंसले से
बाज़ के खूनी पंजे
दबोच लेते हैं उसे।
लेकिन इस पर भी
कोई पंख नहीं फड़कता,
कोई आहट नहीं होती,
कहीं सुगबुगाहट नहीं होती,
क्योंकि जब भी
कोई पंख फड़फड़ाता है,
बाज़ का अगला निशाना
उसी पर सध जाता है।
शहर के बीचों-बीच
गुज़रते हुए लगता है,
हमने अपना धर्म-कर्म का बोध
उठाकर दूर धर दिया है
और पूरा शहर
एक बाज़ के नाम कर दिया है।


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