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04.09.2008
 

लौट आओ अश्व
डॉ० रामनिवास ‘मानव’


होकर जिसकी पीठ पर सवार
दौड़ाता लाया था जिसे मैं
बिन चाबुक, बिन मार,
वही अश्व
अचानक अड़ गया,
बीच राह में बिगड़ गया
और गिराकर मुझे
गोदते हुए मेरा जिस्म
अपने पैने खुरों से,
दौड़ता जा रहा है सरपट,
टपटप-टपटप !
उसकी मन्द होती टापों से
मैं लगाता हूँ अनुमान,
बहुत दूर जा चुका है वह।
मैं कराहता हूँ,
और दबी आवाज में
पुकारता हूँ : लौट आओ अश्व,
मेरे यौवन, ओ प्यारे वक़्त !


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