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04.09.2008
 

चितेरे बोल
डॉ० रामनिवास ‘मानव’


ओ चितेरे बोल तू !
चित्रा यह सुन्दर-मनोहर
विश्व का कैसे रचा ?
रंग ये इतने चुटीले-
नीले-पीले
पाये कहाँ से ?
भाव नव-नव सृजना के
तूलिका में
आये कहाँ से ?
मैं चकित हूँ,
रहस्य अब तो खोल तू !
ओ चितेरे बोल तू !
और यह संगीत-सरिता
संवेदना की
बह रही कलकल ।
नृत्य करती लहरियों में
भाव उच्छल
कह रही छलछल।
मैं चकित हूँ/कौन यह संगीत ?
ओ सुर-साधक बोल तू !
रहस्य सारा खोल तू !


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