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04.09.2008
 

आस्था
डॉ० रामनिवास ‘मानव’


आस्था झील की काई नहीं,
जो यहाँ से वहाँ
हवा के साथ तैर जाये।
आस्था वह पौध भी नहीं,
जिसे इच्छानुसार
बोया और बढ़ाया जाये।

आस्था वह दूब है,
जो बाहर नहीं,
आदमी के भीतर उगती है
और जिसकी ताज़गी
पहली बरसात में फूटी
हरियाली की तरह
सबका मन मोह लेती है।
आस्था आदमी को
आदमी की पहचान देती है।


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