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ISSN 2292-9754

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05.04.2017


संस्कृत भाषा का वैशिष्ट्य

"सम्यग् कृतं परिष्कृतं इति संस्कृतम्"

सम् उपसर्ग पूर्वक कृ धातु से क्त प्रत्यय लगकर निष्पन्न संस्कृत(1) शब्द का अर्थ है-परिष्कृत सुरचित, पुनीत शालीन और सभ्य, जो अभिव्यक्ति की पूर्णता की ओर संकेत करता है।(2) यद्यपि एशिया में अब संस्कृत बोली नहीं जाती तथापि यह दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशियाई सभ्यताओं का ठोस आधार बनी हुई है। विशेष बात तो यह है कि जो लोग इस भाषा को नहीं भी बोलते हैं वे भी इसकी संरचना एवं सिद्धान्तों को अपनी संस्कृति में अनुभव कर सकते हैं। संस्कृत भाषा संस्कृति, मानव-विज्ञान, साहित्य, संगीत(3) कला(4) नाट्य(5) तीर्थाटन व धार्मिक आख्यानों व अनुष्ठानों की शिक्षा का भण्डार है।(6) संस्कृत "विज्ञान एवं तकनीक की सभी शाखाओं" जैसे-चिकित्सा, मानव विज्ञान, वनस्पतिशास्त्र, गणित, अभियान्त्रिकी, वास्तु तथा आहार-विहार आदि को समाविष्ट करती है(7) पाणिनीय व्याकरण संस्कृत की विलक्षण उपलब्धि है। संस्कृत आधुनिक संगणक विज्ञान के प्रवर्तकों के लिए सुझावों का स्रोत बनी हुई है।

संस्कृत की महत्ता प्राचीनता के साथ-साथ उसकी गहन रचनात्मक क्षमता में है। पाश्चात्य विद्वान् प्रायः यह मान लेते हैं कि संस्कृत भाषा में सन्निहित ज्ञान का अन्य भाषाओं में अनुवाद करके उसे वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य में ढाला जा सकता है, परन्तु ऐसा नहीं है। प्रत्येक संस्कृति का सामूहिक संचयी अनुभव उसके विशिष्ट भूगोल एवं इतिहास के अनुसार होता है। विभिन्न संस्कृतियों के विशिष्ट अनुभवों में परस्पर विनिमय सम्भव नहीं क्योंकि इन अनुभवों को व्यक्त करनेवाले शब्दों का उनके मूल रूप में रहना आवश्यक है, यदि भाषा सम्बन्धी श्रेणियाँ समय के साथ लुप्त हो जाती हैं तो सांस्कृतिक अनुभव की विविधताएँ भी नष्ट हो जाती हैं। बहुत सी प्राचीन सांस्कृतिक कलाकृतियाँ दूसरी संस्कृतियों में समान नहीं है और बलात् पश्चिमी साँचे में ढाला जाना, उन्हें हड़पने व विकृत करने जैसा है।

संस्कृत में कुछ विशेष गुण हैं जो धार्मिक दर्शनशास्त्र की विशिष्ट प्रकृति एवं अन्तर्निहित स्वाभाविक प्रसंग को प्रकट करते हैं। संस्कृत मूलभूत ध्वनियों में संयोगों और अन्तर्सम्बन्धों की परते हैं, जो परस्पर आधारभूत कम्पनों के द्वारा परस्पर जुड़ी हुई हैं। अतः बीजगणितीय सूत्र की तरह एक शब्द का पूरा अर्थ उसकी ध्वनियों का समग्र स्वरूप होता है। इसीलिए जब कोई विदेशी संस्कृति अपना सरलीकृत अनुवाद संस्कृत शब्दों पर थोपती है तब हानि ही होती है। यह(8) एक क्रमिक और सूक्ष्म प्रक्रिया है जिसे पुरस्कार, सम्मान और बेहतर जीवन शैली का लालच देकर प्राप्त किया जाता है।

संस्कृत अद्वितीय और अरूपान्तरणीय क्यों है? इसमें निहित सभ्यताएँ दूसरों से अलग क्यों हैं? क्योंकि संस्कृत भाषा के अक्षरों का गठन इस ब्रह्माण्डीय स्पन्दन की गूँज से हुआ है जो मनमाने ढंग से अर्थों का सम्बन्ध ध्वनियों से नहीं जोड़ता। संस्कृत-शास्त्रों को बौद्धिक ज्ञान से समझा जा सकता है, परन्तु कुछ शास्त्र अनुभवात्मक अर्थ के साथ कम्पनों के अनुक्रम हैं और वे केवल योगाभ्यास द्वारा ही जाने जा सकते हैं। संस्कृत ब्रह्माण्ड की अभिन्न एकता को कैसे प्रदर्शित करती है? उत्तर यह है कि अभिन्न एकता को समाविष्ट किए बना हम जिस विविधता का अनुभव करते हैं वही वास्तविकता है। अतः संस्कृत शब्दों का अन्य भाषाओं में अनुवाद नहीं किया जा सकता है। यह संस्कृत की एक अद्भुत विशेषता है।

अनेक भारतीय परम्पराओं ने संस्कृत की प्राचीन गुणवत्ता को ग्रहण करने का प्रयास किया है। कुछ ऋषियों ने अपने अनुभवों को "शक्ति" अथवा "प्राचीन-ऊर्जा" की "प्राणिक अभिव्यक्ति" के रूप में प्रदर्शित किया है तो कुछ ने इस ब्रह्माण्ड की व्याख्या कम्पनशील सत्य के रूप में करने का प्रयास किया। "स्फोट" सिद्धान्त के अनुसार(9)- "ध्वनि" और "अर्थ" वास्तविकता में एक ही सिक्के के दो पहलू हैं और अपने अप्रकट रूप में एक जैसे है।

वाक् के चार स्तर हैं- अव्यक्त, सूक्ष्म, वैचारिक संकल्पना तथा स्थूल वाणी कहते हैं।

"वाक् देवी" मूल ध्वनियों से सभी विचारों, तालों, कम्पनों और प्रत्यक्ष वस्तुओं को हमारे समक्ष लाती है वह ब्रह्माण्डों तथा उस पदार्थ की जन्मदात्री है जिससे ब्रह्माण्ड की रचना होती है।

शब्दब्रह्म ब्रह्माण्ड की प्राचीनतम ध्वनिचेतना है। तान्त्रिक परम्पराओं में प्रत्येक वस्तु की एक अन्तर्निर्मित ध्वन्यात्मक ध्वनि होती है किसी वस्तु के दस से अधिक नाम भी हो सकते हें परन्तु केन्द्रीय बिन्दु अथवा बीजमन्त्र तथा भावार्थ कभी नहीं बदलता। "हिन्दू मनुष्य स्वयं को एक ऐसे जीव के रूप में देखता है जो इस विराट ब्रह्माण्ड अथवा प्रकृति का सच्चा प्रतिरूप है। वह प्रकृति के विषय में ज्ञान अपनी तात्कालिक संवेदनशील जागरूता को योग द्वारा परिष्कृत करके प्राप्त करता है।(10) महर्षि पतंजलि(11) ने "ऋतम्भराबुद्धि(12) का वर्णन किया है।

लेनॉय के अनुसार- हिन्दुओं ने प्रत्यक्ष अनुभूति के माध्यम से संगीतमय मन्त्रोच्चार को, मन्त्रप्रणाली एवं ध्वनितरंगों के स्वर-विज्ञान को, एक साथ जानकर प्राप्त किया।

संस्कृत "योग" की भाषा है। योग के अनुभवों को संस्कृत के अतिरिक्त किसी और भाषा में सही प्रकार से प्रस्तुत करना कठिन है क्योंकि केवल संस्कृत में ही वे अनुभव क्रमबद्ध किए गये हैं।(13) संस्कृत वर्णमाला में जो "एकाक्षरी ध्वनियाँ" हैं वे इस सृष्टि की उत्पत्ति का मूलाधार है। संस्कृत में ध्वनि-कम्पन "परम सत्य" हैं जिन्हें "नाद-ब्रह्म" कहा गया है, जहाँ से सृष्टि की उत्पत्ति होती है। केवल संस्कृत में ही प्रत्येक शब्द को उसकी मूल-ध्वनि में विश्लेषित किया जा सकता है जो उसके मूल और अर्थ को समाविष्ट करता है और जहाँ से वह उत्पन्न हुआ जाना जा सकता है।

शब्द को प्रायः अंग्रेज़ी में "वर्ड" (Word) के रूप में अनुवादित किया जाता है जबकि कई ध्वनिग्राम संयुक्त अनुक्रम में मिलकर एक "शब्द"(14) बनाते हैं। संस्कृत में अलग-अलग अक्षरों अथवा ध्वनिग्राम का अर्थ जानने के लिए एक शब्दकोश है।(15) अंग्रेज़ी में प्राथमिक ध्वनिग्राम या अक्षरों के मूल स्वर का समृद्ध अर्थ है तथा प्रत्येक का चेतना पर विशेष प्रभाव है इसीलिए "शब्द ब्रह्म" कहा जाता है तथा शब्द की शक्ति मुक्ति प्रदान करने जैसी है।(16)

"सृष्टि के आरम्भ में एक मौलिक ध्वनि थी जो विविध मूल ध्वनियों के रूप में पहचानी गई और आगे अभिव्यक्त होकर मिश्रित ध्वनियों के अनुक्रम के फलस्वरूप शब्दों के रूप में प्रकट हुई।" अर्थात् शब्द के प्रकट होने से पहले बहुत कुछ घटित हुआ जबकि कहा गया है कि-"सृष्टि के आरम्भ में शब्द था"।(17)

इसके प्रत्येक स्वर एवं व्यंजन का एक विशिष्ट एवं अपरिहार्य बल है जो वस्तुओं की प्रकृति पर आधारित है न कि विकास या मानवी चयन पर। ये मूलभूत ध्वनियाँ है जो तान्त्रिक बीज-मन्त्रों की जड़ों में स्थित हैं और मन्त्रों की प्रभावकारी शक्ति का स्वयं गठन करती है। मूल-भाषा के प्रत्येक स्वर-व्यंजन का एक प्रारम्भिक अर्थ था जो किसी आवश्यक शक्ति से उत्पन्न हुआ तथा ये अर्थ ही अन्य कई व्युत्पन्न अर्थों का भी आधार बने।"(18)

संस्कृत एक सतत् रचनात्मक भाषा है जिसमें प्रत्येक शब्द विचारों का स्रष्टा और रचनाकार है। अक्षर का शाब्दिक अर्थ है "अविनाशी" अथवा "अनन्त"। "अक्षर" एक ऐसी शाश्वत् ध्वनि है जो कभी नष्ट नहीं होती अपितु भाषा के पूर्ण रहस्य को व्यक्त करती हैं। संस्कृत में "अक्षर"(19) को "वर्ण"(20) भी कहा जाता है जिसका अर्थ है "रंग" अर्थात् अभिव्यक्त होने पर उसका एक स्पष्ट रंग है। इस प्रकार प्रत्येक अक्षर को एक ध्वनि के रूप में सुना जाता है। इसीलिए कहा जाता है ऋषियों ने वेद-मन्त्रों का दर्शन किया, (साक्षात्कार किया)। इस प्रकार वर्णमाला के वर्ण वे गुण या रंग है जिनसे चित्रकार वास्तविकता को चित्रित करता है। मूल ध्वनियाँ एक दूसरे से जुड़कर शब्दों को जन्म देती है जिनके अपने विशिष्ट अर्थ हो सकते हैं। इसलिए यह भी देखा जाता है मूल ध्वनि या शब्द कई अर्थों के लिए भी हो सकता है यहाँ तक कि विपरीत अर्थों को लिए हुए भी।(21)

संस्कृत की संरचना इस चिन्तन पर आधारित है कि इसमें कर्ता की अपेक्षा क्रिया पद्धति पर बल दिया जाता है तथा उस कार्य के लिए किसी को श्रेय की अपेक्षा नहीं रहती। क्योंकि संस्कृत में "कर्मवाच्य-अभिव्यक्ति" अपने आप में प्राकृतिक एवं मान्य पद्धति है। संस्कृत व्याकरण दोनों प्रकार की चरम सीमाओं से बचती है तथा कम्प्यूटर प्रोग्रामिंग भाषा के रूप में कार्य करती है और स्थापित नियमों एवं व्याकरण के सहारे अनेक प्रकार की योजनाओं को जन्म देती है।

उल्लेखनीय है कि बीसवीं सदी तक पश्चिम के प्रमुख विश्वविद्यालयों में भाषा-विज्ञान में शोध करने वाले शोधार्थियों के लिए पाठ्यक्रम में संस्कृत का होना आवश्यक माना जाता था। एक लम्बे समय तक शिक्षण संस्थानों में संस्कृत का तीव्रता से अध्ययन करने के बाद भाषा-विज्ञान को यूरोपीय स्वरूप देकर संस्कृत से अलग कर दिया गया।

"संस्कृत की शक्ति" और "भारतीय धार्मिक परम्परा के साथ संस्कृत के सम्बन्धों" को अमरिकी कवि(22) सहित कुछ पश्चिमी विचारकों ने समझा उन्होंने जिस यूनीवर्सिटी(23) में संस्कृत का अध्ययन किया वहाँ पर संस्कृतभाषा, "दर्शनशास्त्र" के पाठ्यक्रम का अनिवार्य भाग थी। उन्होंने अपनी अन्तर्दृष्टि एक प्रमुख कविता(24) में व्यक्त की जिसमें उन्होंने "दा" ध्वनिग्राम के विविध अर्थों का अन्वेषण किया तथा अपनी कविता का अन्त "शान्तिः शान्तिः शान्तिः" के द्वारा किया यद्यपि वे अपने सांस्कृतिक पालन पोषण एवं मानसिकता के कारण हिन्दू व बौद्ध धर्म को नहीं अपना सके, उन्हें पता था कि संस्कृत शब्दों का अंग्रेज़ी में उपयुक्त अनुवाद नहीं किया जा सकता इलियट समझ चुके थे कि किसी मन्त्र का प्रभाव केवल उसके अर्थ पर ही निर्भर नहीं करता बल्कि उसके सटीक उच्चारण पर भी निर्भर करता है।

संस्कृत को भारत के कुछ मुस्लिम शासकों ने भी संरक्षण प्रदान किया था उन्होंने अपने पुरालेख पत्र संस्कृत भाषा में लिखवाए थे। यह संस्कृत का वैज्ञानिक और धर्म निरपेक्ष पक्ष ही था। महाकवि कालिदास के समय तक संस्कृत, विद्वज्जनों की चहेती बन चुकी थी और वह उनके विचारों एवं कलाकृतियों में परिलक्षित होती थी। संस्कृत की विशिष्ट संरचना तथा लचीलेपन के कारण स्थानीय संस्कृति और भाषा उसमें आत्मसात् हो जाती है। विद्वानों के द्वारा स्थानीय भाषाओं और संस्कृत के पारस्परिक प्रभाव को समझा गया। अतः एशिया की विविध भाषाओं द्वारा संस्कृत एक मूल-भाषा और श्रेणियों की रूपरेखा की तरह उपयोग में लाई गई। ध्यातव्य है कि आत्मसात् करना तथा हड़पना दोनों अलग बाते हैं। हड़पना आत्मसात् करना कभी नहीं हो सकता।

उल्लेखनीय है कि जब एक बार स्थानीय या क्षेत्रीय सांस्कृतिक लक्षणों को संस्कृति में अभिलिखित कर मन्त्रवत् ढाल दिया जाता है तो वे संस्कृति के अभिन्न अंग बन जाते हैं परन्तु जब संस्कृति के तत्वों को स्थानीय क्षेत्रीय पहचान या रंग दे दिया जाता है तब वे एक विशिष्ट पहचान ग्रहण कर लेते हैं।

इण्डोनेशिया के राजा(25) नालन्दा विश्वविद्यालय के इतने बड़े समर्थक थे कि उन्होंने नालन्दा वि.वि. को प्रचुर मात्रा में दान किया।(26) प्रतिभाशाली एशियाई छात्र भारत के प्रमुख शिक्षा केन्द्रों(27) में शिक्षा प्राप्त करने जाते थे।

प्रारम्भिक बौद्धग्रन्थ पालि एवं अन्य प्राकृत(28) भाषाओं में थे परन्तु बाद में "मिश्रित संस्कृत" में लिखे गये उस समय मौखिक एवं लिखित संवाद के लिए परिशुद्ध पाणिनीय संस्कृत का चलन था। तिब्बती लिपि और व्याकरण, संस्कृत के आधार पर विकसित की गई वास्तव में वह दर्पण में संस्कृत का ही प्रतिबिम्ब है।

थाईलैंड में बहुत पहले(29) से ही संस्कृत का स्पष्ट प्रभाव रहा था वहाँ और दक्षिण पूर्व एशिया के अन्य भागों में संस्कृत को सार्वजनिक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं प्रशासनिक प्रयोजनों के लिए उपयोग किया जाता था। आज भी वहाँ संस्कृत को शाही उत्तराधिकारी की मान्यता, वैधता एवं प्रसारण तथा औपचारिक अनुष्ठानों को प्रतिस्थापित करने के माध्यम के रूप में अत्यधिक सम्मान दिया जाता है।

संस्कृत को ग्रहण करने वाली संस्कृतियों ने इसे अपने में समाविष्ट करना अति लाभकारी माना और हिन्दू बौद्ध इतिहास (अतीत के आख्यानों) पुराणों, प्रतीकों, अनुष्ठानों, सिद्धान्तों तथा शासन चलाने के विचारों एवं भारतीय सौन्दर्य शास्त्र को भारत की धरती पर खोजा। इसका प्रमाण यह है कि-एक हज़ार से भी अधिक वर्षों तक चीन, तिब्बत, थाईलैण्ड, म्याँमार, कम्बोडिया, वियतनाम, श्रीलंका एवं अन्य देशों के शासकों ने अपने प्रतिभाशाली छात्रों को भारत के "विहारों(30) में ज्ञान प्राप्त करने के लिए भेजा।

संस्कृत के विषय में एक बात निश्चय ही कहने योग्य है कि संस्कृत शब्दों का अनुवाद नहीं किया जा सकता। यद्यपि संस्कृत के प्राचीन शास्त्रों का संरक्षण और अनुवाद करने के लिए महत्त्वपूर्ण कदम उदार प्रवृत्ति वालों के द्वारा उठाए जा रहे हैं ये प्रयास प्रशंसनीय तो हैं परन्तु आध्यात्मिक साधना और सामाजिक संगठन के संसाधन के रूप में मूल भाषा की शब्दावली और शास्त्रों के महत्त्व को समझने के लिए इन्हें विकल्प नहीं बनाया जा सकता और न ही ये प्रयास आधुनिक विश्वविद्यालयों से संस्कृत को पाठ्यक्रम से हटाने के षडयन्त्र का निवारण कर पाएँगे।

संस्कृत में कुछ और ऐसे विशेष गुण हैं जो धार्मिक दर्शनशास्त्र की विशिष्ट प्रकृति एवं अन्तर्निहित स्वाभाविक प्रसंग को प्रकट करते हैं। प्राचीन शरीस्वैज्ञानिकों ने शरीर की संवेदनशीलता को नैतिक महत्त्व दिया। भारतीय वैयाकरण भाषा-विज्ञान के नियमों को ब्रह्माण्ड के स्वरूप के साथ जोड़कर देखते हैं। संस्कृत आत्मज्ञान की प्राप्ति का लिए एक उत्तम माध्यम है। संस्कृत मूलस्रोत की ओर वापस लौटने का अनुभवात्मक मार्ग प्रदान करती है। जैसे- एक मौलिक कम्पन "क" मूल ध्वनि ख- सूक्ष्म ध्वनि "ग" अन्ततः स्थूल ध्वनि "घ" में बदल जाता है तब संस्कृत के माध्यम से क्रमशः घ (श्रव्य ध्वनि या स्थूल)- ग सूक्ष्म ध्वनि- ख मूल ध्वनि और - मौलिक कम्पन "क" तक वापस पहुँच सकते हैं।

वैज्ञानिक अनुसन्धान इस बात का दावा करते हैं कि बिना अर्थ जाने हुए भी वैदिक संस्कृत शास्त्रों को पढ़ने व उच्चारण करने पर भी एक विशिष्ट शारीरिक अनुभूति व मनः स्थिति उत्पन्न होती है। क्योंकि संस्कृत मन्त्रों को बचपन में ही कण्ठस्थ करवाने का कारण यह है कि उन मन्त्रों के प्रभाव व लाभ का अनुभव समय के साथ-साथ होता रहता है। श्री अरविन्द इसे ही संस्करण कहते हैं जो व्यक्ति के भावी विकास का आधार है। मन्त्र भी बीज की भाँति बोया जाता है और पेड़ के समान विकसित होकर फलता है। "मन्त्र एक ऐसा शब्द है जिसमें देवतत्त्व की शक्ति है तथा वह देवत्व को मानवचेतना एवं उसकी कार्यपद्धति में स्थापित कर सकता है, अनन्त के रोमांच और किसी परमशक्ति को जागृत कर सकता है व परम सत्य के ज्ञान के चमत्कार को स्थाई बना सकता है।"(31)

संस्कृत विद्वानों ने जोन्स के समय से ही पश्चिमी शिक्षा संस्थानों में भाषा-विज्ञान के सृजन में अपना योगदान दिया। यूरोप में संस्कृत के विद्वान् आधुनिक भाषा-विज्ञान को एक शैक्षिक अनुशासन के रूप में स्थापित करने वाले, प्रारम्भिक विकासकर्ता थे।

संस्कृत में "समानार्थक शब्दों को क्रमबद्ध करने वाला" एक ग्रन्थ है(32) जिसमें एक-एक शब्द के सत्तर तक पर्यायवाची बतलाए गए हैं। सभी सार्थक हैं सन्दर्भ के अनुसार प्रयुक्त होने योग्य हैं। कवित्वशक्ति एवं प्रतिभा-सम्पन्न साहित्यकार उनका प्रयोग बड़ी कुशलता पूर्वक अपने ग्रन्थ में करता है। इस प्रकार संस्कृत एक सतत् रचनात्मक भाषा है और इसका प्रत्येक शब्द विचारों का सृष्टा और रचनाकार है।

जयतु संस्कृतम्

रामकेश्वर तिवारी
असिस्टेण्ट प्रोफेसर सह व्याकरण विभागाध्यक्ष
श्री बैकुण्ठनाथ पवहारि संस्कृत महाविद्यालय
बैकुण्ठपुर, देवरिया, उत्तरप्रदेश

 

सन्दर्भ

1. अमरकोश में संस्कृत शब्द के 8 अर्थ बतलाए गए हैं।
2. वाण्येका समलंकरोति पुरूषं या संस्कृता धार्यते (नीतिशतकम्)
3. "गीतं वाद्यं नृत्यं च त्रयं संगीतमुच्यते"
4. (1)ललित कलाएँ (2) उपयोगी कलाएँ
5. अवस्थानुकृतिर्नाट्यम् (दशरूपक)
6. साहित्यसंगीतकलाविहीनः साक्षात्पशुपुच्छविषाणहीनः (नीतिशतकम्)
7. संस्कृते सर्वं प्रतिष्ठितम्
8. संस्कृत शब्दों का विदेशी भाषा में अनुवाद
9. बुधैर्वैयाकरणैः प्रधानभूत स्फोटरूपव्य॰जकस्य शब्दस्य ध्वनिरिति व्यवहारः कृतः।
(काव्यशास्त्र व पाणिनीयदर्शन का एक सिद्धान्त)
10. रिचर्ड लेनॉय
11. पातंजलयोगसूत्र में
12. ऋतम्भरा तत्र प्रज्ञा (पा0यो0सू0)
13. श्री अरविन्द
14. ध्वनिग्राम का समूह ध्वनि और ध्वनियों का समूह शब्द
15. एकाक्षरकोश
16. एकः शब्दः सुप्रयुक्तः सम्यग् ज्ञातः स्वर्गेलोकच कामधुग् भवति
17. बाइबल में
18. श्री अरविन्द
19. न क्षरति इति अक्षर (अविनाशी) "एकाक्षरं परंब्रह्म" मनु0
20. सवर्णम् अक्षरम् (शब्द की मात्रा)
21. विपरीतार्थक या विलोम शब्द
22. टी.एस. इलियट
23. हारवर्ड
24. द वेस्ट लैण्ड
25. राजा बलदेव
26. सन् 860 में
27. तक्षशिला, नालन्दा, वलभी, काशी आदि
28. स्थानीय जनभाषाओं में
29. सन् 1500 ई.
30. शिक्षण संस्थानों
31. श्री अरविन्द
32. अमरकोष


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