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| 02.16.2009 |
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ऊँचाई रामेश्वर कम्बोज ‘हिमांशु’ |
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पिताजी के अचानक आ धमकने से पत्नी तमतमा उठी, “लगता है बूढ़े को पैसों की ज़रूरत आ पड़ी है, वर्ना यहाँ कौन आने वाला था। अपने पेट का गड्ढा भरता नहीं, घर वालों का कुआँ कहाँ से भरोगे?” मैं नज़रें बचाकर दूसरी ओर देखने लगा। पिताजी नल पर हाथ-मुँह धोकर सफर की थकान दूर कर रहे थे। इस बार मेरा हाथ कुछ ज्यादा ही तंग हो गया। बड़े बेटे का जूता मुँह बा चुका है। वह स्कूल जाने के वक्त रोज़ भुनभुनाता है। पत्नी के इलाज़ के लिए पूरी दवाइयाँ नहीं खरीदी जा सकीं। बाबू जी को भी अभी आना था।
घर
में
बोझिल
चुप्पी
पसरी
हुई
थी।
खान
खा
चुकने
पर
पिताजी
ने
मुझे
पास
बैठने
का
इशारा
किया।
मैं
शंकित
था
कि
कोई
आर्थिक
समस्या
लेकर
आए
होंगे।
पिताजी
कुर्सी
पर
उकड़ू
बैठ
गए।
एकदम
बेफिक्र, “सुनो” -कहकर
उन्होंने
मेरा
ध्यान
अपनी
ओर
खींचा।
मैं
साँस
रोककर
उनके
मुँह
की
ओर
देखने
लगा।
रोम-रोम
कान
बनकर
अगला
वाक्य
सुनने
के
लिए
चौकन्ना
था। उन्होंने जेब से सौ-सौ के दस नोट निकालकर मेरी तरफ़ बढ़ा दिए- “रख लो। तुम्हारे काम आ जाएँगे। इस बार धान की फ़सल अच्छी हो गई है। घर में कोई दिक्कत नहीं है। तुम बहुत कमज़ोर लग रहे हो। ढंग से खाया-पिया करो। बहू का भी ध्यान रखो।”
मैं
कुछ
नहीं
बोल
पाया।
शब्द
जैसे
मेरे
हलक
में
फँसकर
रह
गए
हों।
मैं
कुछ
कहता
इससे
पूर्व
ही
पिताजी
ने
प्यार
से
डाँटा- “ले
लो।
बहुत
बड़े
हो
गए
हो
क्या?” |
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