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| 02.16.2009 |
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उजाले रामेश्वर कम्बोज ‘हिमांशु’ |
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उम्र भर रहते नहीं हैं संग में सबके उजाले । हैसियत पहचानते हैं ज़िन्दगी के दौर काले । तुम थके हो मान लेते- हैं सफ़र यह ज़िन्दगी का। रोकता रस्ता न कोई प्यार का या बन्दगी का। हैं यहीं मुस्कान मन की हैं यहीं पर दर्द-छाले। तुम हँसोगे ये अँधेरा, दूर होता जाएगा। तुम हँसोगे रास्ता भी गाएगा मुस्कराएगा। बैठना मत मोड़ पर तू दीप देहरी पर जलाले। |
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