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| 02.16.2009 |
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नव वर्ष रामेश्वर कम्बोज ‘हिमांशु’ |
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सागर में सब आँसू बहाकर आ गया । सैलाब रौशनी का जगाकर आ गया । किरनों के उजले रथ पर होकर सवार, गागर सुधारस का छलकाकर आ गया। पर्वतों- घाटियों में उछलता –कूदता, रूप-नदी में गोता लगाकर आ गया । गुनगुनी धूप बनकर आँगन में उतरा ; नव वर्ष सब दूरियाँ मिटाकर आ गया । |
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