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05.03.2012
 
नव वर्ष
रामेश्वर कम्बोज हिमांशु

सागर में सब आँसू
बहाकर आ गया ।
सैलाब रौशनी का
जगाकर आ गया ।

किरनों के उजले रथ
पर होकर सवार,
गागर सुधारस का
छलकाकर आ गया।

पर्वतों- घाटियों में
उछलता –कूदता,
रूप-नदी में गोता
लगाकर आ गया ।

गुनगुनी धूप बनकर
आँगन में उतरा ;
नव वर्ष सब दूरियाँ
मिटाकर आ गया ।
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