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05.03.2012
 
मुक्तक
रामेश्वर कम्बोज हिमांशु

बस्ती एक बसाई थी कल
वहाँ पर ढेरों फूल खिलाए।
आज पहुँचकर सन्नाटे में
आशाओं की पौध लगाएँ।।

नहीं हम रहे रोशनी चुराने वाले
हम अँधेरों में दीपक जलाने वाले।
यही सूरज से सीखा, चाँद से जाना
सदा चमकते उजाला लुटाने वाले।।
 
तूफानों में दीपक जलाते चलें
हर मुश्किल में हम गीत गाते चलें।
चलना जिसे साथ वह खुशी से चले
हर दुखी को गले से लगाते चलें।।
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