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| 02.16.2009 |
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मुक्तक रामेश्वर कम्बोज ‘हिमांशु’ |
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बस्ती एक बसाई थी कल वहाँ पर ढेरों फूल खिलाए। आज पहुँचकर सन्नाटे में आशाओं की पौध लगाएँ।। नहीं हम रहे रोशनी चुराने वाले हम अँधेरों में दीपक जलाने वाले। यही सूरज से सीखा, चाँद से जाना सदा चमकते उजाला लुटाने वाले।। तूफानों में दीपक जलाते चलें हर मुश्किल में हम गीत गाते चलें। चलना जिसे साथ वह खुशी से चले हर दुखी को गले से लगाते चलें।। |
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