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04.28.2007
 
जयशंकर प्रसाद की लघुकथाएँ
रामेश्वर कम्बोज हिमांशु

जयंशकर प्रसाद आधुनिक हिन्दी साहित्य के उन गिने-चुने साहित्यकारों में से एक हैं, जिनके साहित्य में भारतीय संस्कृति, जनचेतना, उदात्त्ता, मानव मूल्यों के प्रति चिंता एवं मनोभूमि के उतार-चढ़ाव का सजग अवगाहन मिलता है। युग के प्रति सजगता, ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में वर्तमान का विश्लेषण, स्वच्छंदतावादी कलात्मक दृष्टिकोण, भावानुभूति, प्रकृति के प्रति अनुराग, भाषा की चारुता, शब्द -विन्यास की कोमलता, चितंन की तार्किकता और इन सबके ऊपर मानव चरित्र की सूक्ष्मातिसूक्ष्म परख इनकी शक्ति रही है। प्रसाद अपने युग के ऐसे प्रस्थान बिंदु पर खड़े हैं, जहाँ एक ओर उनकी दृष्टि प्राचीन भारतीय गौरव के महिमामंडित स्वरूप पर केंद्रित है तो दूसरी ओर भविष्य की चिंता से उद्वेलित भी है। वर्तमान की वेदना से उबरने का मार्ग तलाश करना इन चिंताओं के मूल में है। अतीत भावमुग्ध होने के लिए नहीं, बल्कि वर्तमान जड़ता को तोड़ने के लिए है; भविष्य की आशा निराधार कल्पना या शब्द विलास नहीं, वरन्‌ कटु एवं असह्य वर्तमान की दिशा बदलने के लिए उठा वामन-चरण है। सामाजिक जीवन के लिए व्यक्तिगत सुख-साधनों का उत्सर्ग, उदात्त आदर्श की स्थापना के लिए संघर्ष, रुढ़ियों एवं आडंबरों के प्रति साहसपूर्ण प्रतिरोध एवं विद्रोह का स्वर इनकी सभी कृतियों में समाहित है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि इनके लिए अतीतजीवी होना या घटनाओं और तिथियों का दोहराव नहीं, वरन्‌ तात्कालिक आवश्यकता है, वर्तमान का उत्तर तलाशने की व्याकुलता है। इन्हें अतीत या अतीत के चित्र और चरित्र उतने ही स्वीकार्य हैं, जितने वे वर्तमान के निर्माण में सहायक हैं। अवरोधक बनी प्राचीन व्यवस्था या दम तोड़ती, प्रतिहिंसा जगाती किसी विचार-संस्कृति के प्रति कोई मोहजनित आग्रह नहीं है।