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| 02.16.2009 |
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बरसाती नदी रामेश्वर कम्बोज ‘हिमांशु’ |
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अभिशप्त -सी लेटी हुई है असहाय बरसाती नदी। बगूलों को शीश पर लपेटे नज़र आती नदी।। रेत के लम्बे सफर में हाँफने लगी है धूप । हुआ दुर्लभ दो बूँद जल तृषित छटपटाती नदी। रूठकर बैठा है मौसम मेघ परदेसी हुए । थक गई हर रोज़ इक यहाँ भेजकर पाती नदी। गए पखेरू छोड़ करके नीड़ अपने तीर के। बीते दिनों की याद कर रह - रह अकुलाती नदी।। जब बरसते मेघ छमछम सभी किनारे तोड़कर। बस्तियों को लील करके बहुत कहर ढाती नदी।। |
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