अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली मुख्य पृष्ठ
02.16.2009
 
बहता जल
रामेश्वर कम्बोज हिमांशु

हम तो बहता जल नदिया का,
अपनी यही कहानी बाबा।
ठोकर खाना उठना गिरना,
अपनी कथा पुरानी बाबा।
कब भोर हुई कब साँझ हुई,
आई कहाँ जवानी बाबा।
तीरथ हो या नदी घाट पर,
हम तो केवल पानी बाबा।
जो भी पाया वही लुटाया,
ऐसे औघड़ दानी बाबा।
अपने किस्से भूख-प्यास के,
कहीं न राजा-रानी बाबा।
घाव पीठ पर मन पर अनगिन,
हमको मिली निशानी बाबा।

अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें