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05.03.2012
 
आचरण का गोमुख
रामेश्वर कम्बोज हिमांशु

 

यदि आचरण का गोमुख सूखने लगे तो चरित्र की गंगा की पावन  धारा  एक न एक दिन विलुप्त हो जाएगी। रास्ते के गन्दे नालों का पानी गंगा में डाल दिया जाएगा तो वह और अपवित्र हो जाएगी। फिर कौन श्रद्धालु उस गंगा में स्नान करके स्वस्थ रह सकेगा? आज ऐसी ही एक चुनौती देश के सामने है। गन्दे नाले ही यदि स्वयं को गंगा कहने लगें तो असली जाह्नवी का क्या होगा? कौन पूछेगा उसे? भ्रष्ट और बड़बोले लोग अगर नैतिकता के प्रतीक और ध्वजावाहक बन जाएँगे तो फिर समाज का भगवान ही मालिक है।

हर तथाकथित बड़ा आदमी युवा पीढ़ी से राष्ट्र निर्माण की अपेक्षा रखता है, नए भविष्य को सॅंवारने बात करता है, नई जाग्रति लाने की बात करता है; परन्तु यह बड़ा आदमी राष्ट्र की जड़ों को रात दिन दीमक की तरह चाट रहा है, नए भविष्य की भ्रूण हत्या कर रहा है, अघोरी बनकर अन्धकार लाने की मसान पूजा कर रहा है। ऐसा व्यक्ति किसी का पथप्रदर्शक कैसे होगा?

नई पीढ़ी किससे दिशा प्राप्त करे? गोमुख को सूखने से कैसे बचाया जाए? आचरण को पदमर्दित करने वाले लोग हमारे राष्ट्र को कब तक कमजोर करते रहेंगे? दूषित नाले कब तक पुण्यसलिला का भ्रम फैलाते रहेंगे? ये प्रश्न हर बार मन को मथते हैं।

नैतिकता भाषण देने से नहीं पनपती। नैतिक मूल्यों को केवल पाठ्यक्रम में रख देने से ही नैतिकता नहीं आती। नैतिकता का पाठ आचरण में  ढालकर पढ़ा जाता है; लेकिन अब उल्टा हो रहा है। नैतिक आचरण की किसी को दरकार नहीं। सारा जोर, सारा आवेश इस बात को लेकर है कि भ्रष्ट कैसे हुआ जाए? जो भ्रष्टाचार में साझीदार नहीं हुआ है, उसे कैसे सबक सिखाया जाए? ये सारे यक्ष प्रश्न हर जिम्मेदार आदमी को आहत करते हैं।

चरित्रहनन करने वाली इस सुनामी लहर से नई पीढी को बचाना होगा। इस कार्य को केवल शिक्षाजगत् के लोग कर सकते हैं। शिक्षाजगत् जिसकी नींव त्याग और तपस्या पर टिकी हो, जो मनसा वाचा कर्मणा नन्हीं पौध को सींचने की भावना रखता हो, जो हर विद्यार्थी को अपनी संतान की तरह समझता हो, उसकी भावनाओं की कद्र करता हो उसके आँसू से द्रवित और मुस्कान से हर्षित होता हो। टेढी भौं वाले या जिन्हें अपनी सन्तान से भी प्यार न हो; उनकी शिक्षाजगत् को आवयकता नहीं। जिनको भद्रजन के बीच बैठकर बात करने का सलीका न हो, जिनकी वाणी विचारों के निर्मल नीर की बजाय कुत्सित विचारों का गटर बन गई हो; उनसे हमें कुछ नहीं कहना है। ऐसे लोग हमारे समाज के कोढ़ में खाज की तरह हैं। जैसे विचार होंगे, वैसी ही वाणी होगी। कुत्सित विचारों की त्रासदी वाणी को केवल अभिशप्त कर सकती है, वरदान नहीं दे सकती। अत: विद्यालय एवं अभिभावकों का दायित्व है कि नई पीढी के भविष्य को निर्मित करने के लिए मिलकर सोचें, संकल्प लें; तभी नव कुसुम प्रफुल्लित हो सकेंगे।

मैं निराशा नहीं हूँ। मुझे आशा है शिक्षाजगत् से जुड़े लोग मर खपकर ही सही; शुभ को बचाने में सफल होंगे। हमारी नई पीढ़ी को ज़रूर दिशा मिलेगी। हमारा राष्ट्र और सबल होगा, हम सब मिलकर जीवन के हर अभिशाप को वरदान में बदलने का मादा रखते हैं। अपनी बात का समापन इन पंक्तियों से करना चाहूँगा

 

नहीं हम रहे रौशनी चुराने वाले

हम अँधेरों में दीपक जलाने वाले।

यही सूरज से सीखा, चाँद से जाना

सदा चमकते उजाला लुटाने वाले


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