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| 05.04.2008 |
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4-मुक्तक रामेश्वर कम्बोज ‘हिमांशु’ |
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अपनी परछाई भी कभी धोखा दे देती, पर आँसू का साथ उम्र भर का होता है । हँसने के तो गीत विदूषक गा देते हैं, किन्तु विछोह की आग सिर्फ़ हृदय ढोता है ॥ >>>>>> तुम्हारे इन्तज़ार में हम मज़ार बन बैठे हो सके तो तुम कभी चिराग़ जलाते रहना । हमसे अगर नहीं है मुहब्बत अब भी तुमको कसम है तुम्हें-यह राज़ किसी से न कहना ॥ >>>>>>>> कटती ज़िन्दगी कैसे बेचारा फूल क्या जाने गुज़रती दिल पर क्या-क्या यह तो ख़ार से पूछो । किनारों पर आकर भी कुछ तो डूब जाते हैं जो डूबकर भी बच निकले मझधार से पूछो ॥ >>>>>> संकल्प जगें तो पर्वत भी हिल जाया करते हैं । टूट-टूट्कर शिखर धूल में मिल जाया करते हैं । मरुभूमि सहचरी बन सरिता हरियाली भरती हथेली पर काँटों की फूल खिल जाया करते हैं ॥ |
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