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ISSN 2292-9754

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01.27.2016


दोहे

1
बेकल था तेरा हिया, मैं हो उठा अधीर।
मैं रोया इस पार था, तुम्हें उठी जो पीर॥
2
तुम जागे थे रात भर, दूर कहीं परदेस।
हम सपनों में खोजते, धरे जोगिया भेस॥
3
द्वार तुम्हारा तो मिला, तुम थे गुमसुम मौन।
हमने बाँचा हूक को, और बाँचता कौन॥
4
साँस रही परदेस में, जुड़ी कहीं पर डोर।
प्रेम नाम जिसको दिया, उसका मिला न छोर॥
5
किया आचमन मन्त्र पढ़,सुबह-शाम जो नीर।
पोर पोर नम कर गई, वो थी तेरी पीर॥
6
ढूँढ़ा जिसको उम्र भर, उसको कहते प्रीत।
धरती-सागर खोज के, मिले तुम्हीं बस मीत।
7
अपने ही घर में लगा, हम हैं पाहुन आज।
भोर हुई तो चल पड़े, अपने-अपने काज ।
8
मन्दिर जाकर क्या करूँ, मुझको मिला न चैन।
पण्डित जो रहता वहाँ, वह भी है बेचैन॥
9
दो पल में माटी हुआ, जीवन भर का मेल।
हमसे खेले यार सब, सदा कपट का खेल॥
10
कुटिया रोई रात भर, ले भूख और प्यास।
महल बेहया हो गया, करता है परिहास॥
11
दीमक फ़सलें चट करें, घूम-घूम घर द्वार।
गाँव-नगर लूटे सभी, लूटे सब बाज़ार ॥
12
इज़्ज़त लुटी गरीब की, लूट लिया हर कौर।
डाकू तो बदनाम थे, लूटे कोई और ॥
13
पोथी से डरकर छुपा, जेबों में कानून।
जिसकी जेबें हों भरी, उसको चढ़े जुनून ॥
14
कर्ज़ चढ़ा हल तक बिका, बिके खेत खलिहान।
दो रोटी की भूख थी, सिर्फ़ बचा अपमान॥


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