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05.17.2009
 

सब कुछ अपने मन का ही हो
रमेश तैलंग


सब कुछ अपने मन का ही हो, ऐसा कब होता है
गतिरोधों से टकरा कर, जीवन संभव होता है

पलकों तक आए और मन में, हलचल पैदा नहीं करे
ऐसा आँसू ज़िंदा हो कर भी एक शव होता है।

एकाकी लोगों से पूछो तो शायद यह पता चले
सूनेपन के अंदर-अंदर भी कलरव होता है

भली-भली बातों से कोई अच्छी कथा नहीं बनती
श्याम रंग का श्वेतों में गहरा मतलब होता है।


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