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04.18.2014


रीति रिवाज़ पुराने अब भी

रीति रिवाज़ पुराने अब भी निभा रही है माँ।
जो खोने वाला है उसको बचा रही है माँ।

यूँ तो आँखों में उसके बस स्याह अँधेरे हैं
उम्मीदों के दीपक फिर भी जला रही है माँ।

लौट-लौट कर आते हैं पँछी स्मृतियों के
जाने कब से उनको दाने चुगा रही है माँ।

मान और अपमान एक जैसे ही लगते हैं,
दो बेटों को छाती से ज्यों लगा रही है माँ।

चेहरे की झुर्रियों, श्वेत केशों के जंगल में
रोज़ नया उत्सव जीवन का मना रहीं है माँ।


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