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| 05.17.2009 |
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जिससे थोड़ा लगाव होने लगा |
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जिससे थोड़ा लगाव होने लगा। ये नियति का ही तो क़रिश्मा है, जिस्म दो जान एक थे जो कल, गर्म बाज़ार हुआ रिश्तों का, पहले होता था सिर्फ क़िश्तों में, या तो हम ही बहुत ख़राब हुए, |
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