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ISSN 2292-9754

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03.15.2015


हवा में, धूप में, मिट्टी में और पानी में

हवा में, धूप में, मिट्टी में और पानी में।
तेरी मौजूदगी दिखती है हर निशानी में।

तू मेरा रहनुमा नहीं तो बता फिर क्या है
हर कदम साथ है तू भीड़ में, वीरानी में।

एक तू ही तो है जो मुझको याद आता है,
हर मुसीबत में, दुःख में, और परेशानी में।

जो तुझसे दूर हैं वो भी हैं तुझसे दूर कहाँ,
ज़मीं, फ़लक सभी हैं तेरी निगहबानी मे।

न सही रोशनी, महक तो तेरी ज़िंदा है
मेरी इन डूबती साँसों की धूपदानी में।

हर एक लम्हे को ज़िंदादिली से जीता रहूँ,
और क्या करना है छोटी-सी ज़िंदगानी में।


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