रमेश तैलंग

दीवान
आसमान की ऊँचाई पाकर
जिससे थोड़ा लगाव होने लगा
जैसे भी हो, थोड़े-बहुत उजाले
तसल्लियाँ ही झूठी दे के
नदी बहती रहे जब तक
बच्चों पर दिन भारी देखे
रीति रिवाज़ पुराने अब भी
सपना तब तक ही सुंदर है
सब कुछ अपने मन का ही हो
हवा में, धूप में, मिट्टी में और पानी में